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Vinita Tomar

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VINITA TOMAR Main Face of Patparganj (With Full Family) as AAP Volunteer * in Present  Booth Adyaksh of Booth 23 MLA Representative In RSKV West Vinod Nagar A-196, Gali No. 5, North A Block, West Vinod Nagar Delhi India  Pin 110092 Contact No. 09958858758 PERSONAL DATA Date Of Birth :      February 08, 1972 Height                   5fit 3' Weight.                  74kg Religion.                 Hindu Occupation.          Social Worker                                 cum  House Wife Husband   Jitender Singh Tomar.   (M.A., B.Ed, MASSCOM, DNYS {Naturopathy})  * Social Worker * Main Face of Patparganj as AAP Volunteer Address : A 136, North A Block, West Vinod Nagar Delhi India Pin 110092...

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र विशेष

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*सिद्ध कुंजिका स्तोत्र विशेष* 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जीवन में सफलता की कुंजी है "सिद्ध कुंजिका" दुर्गा सप्तशती में वर्णित सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक अत्यंत चमत्कारिक और तीव्र प्रभाव दिखाने वाला स्तोत्र है। जो लोग पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते वे केवल कुंजिका स्तोत्र का पाठ करेंगे तो उससे भी संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का फल मिल जाता है। जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव, रोग, कष्ट, दुख, दारिद्रय और शत्रुओं का नाश करने वाले सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ नवरात्रि में अवश्य करना चाहिए। लेकिन इस स्तोत्र का पाठ करने में कुछ सावधानियां भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाना आवश्यक है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पाठ की विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कुंजिका स्तोत्र का पाठ वैसे तो किसी भी माह, दिन में किया जा सकता है, लेकिन नवरात्रि में यह अधिक प्रभावी होता है। कुंजिका स्तोत्र साधना भी होती है, लेकिन यहां हम इसकी सर्वमान्य विधि का वर्णन कर रहे हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन से नवमी तक प्रतिदिन इसका पाठ किया जाता है। इसलिए साधक प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर अपन...

श्रीदुर्गासप्तशती की ॥ पाठविधिः ॥ शापोद्धारः सहित

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श्रीदुर्गासप्तशती की  ॥पाठवि धिः॥ शापोद्धारः सहित * 1. साधक स्नान करके पवित्र हों जाएं। * 2. अपने पास में गंगाजल युक्त शुद्ध जल, पूजन-सामग्री और श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक रखे। * 3. आसन-शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करें। * 4.  पूर्वाभिमुख होकर अर्थात पूर्व की ओर मुख करके शुद्ध आसन पर बैठे। * 5. पुस्तक को अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दे।  * 6. ललाट में अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगाएं।,  * 7. यदि शिखा रखते हैं तो शिखा बाँध ले। यदि नहीं, तो सिर पर कोई वस्त्र ढक लें। * 8. फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व-शुद्धि के लिये अग्रालिखित चार मन्त्रों से चार बार आचमन करे।  ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥ ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥ * 9.  त्पश्‍चात् प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें; फिर * 10. पवित्रीधारण दाहिनी अनामिका में दो कुश की तथा बायीं में तीन की पवित्री धारण करें ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सव...

श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम्

श्री महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् अयि गिरि-नन्दिनि नन्दित-मेदिनि विश्व-विनोदिनि नन्दनुते गिरिवर विन्ध्य-शिरोऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णु-नुते । भगवति हे शिति-कण्ठ-कुटुम्बिणि भूरि-कुटुम्बिणि भूरिकृते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैलसुते ॥ 1 ॥ सुरवर-हर्षिणि दुर्धर-धर्षिणि दुर्मुख-मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवन-पोषिणि शङ्कर-तोषिणि कल्मष-मोषिणि घोषरते । दनुज-निरोषिणि दितिसुत-रोषिणि दुर्मद-शोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैलसुते ॥ 2 ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब-वन - प्रिय-वासिनि हासरते शिखरि-शिरोमणि तुङ-हिमालय-शृङ्ग-निज-आलय-मध्यगते । मधुमधुरे मधु-कैटभ-गञ्जिनि कैटभ-भञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैलसुते ॥ 3 ॥ अयि शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड-गजाधि-पते रिपु-गज-गण्ड-विदारण-चण्ड-पराक्रम-शौण्ड-मृगाधि-पते । निज-भुजदण्ड-निपाटित-चण्ड-निपाटित-मुण्ड-भटाधि-पते जय जय हे महिषासुर-मर्दिनि रम्य-कपर्दिनि शैलसुते ॥ 4 ॥ अयि रणदुर्मद-शत्रु-वधोदित-दुर्धर-निर्जर-शक्ति-भृते चतुर-विचार-धुरीण-महाशय-दूत-कृत-प्रमथाधिपते । दुरित-दुरीह-दुराशय-दुर्मति-दा...

10. दशम् नवरात्र पूजा || अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

॥उपसंहारः॥ इस प्रकार सप्तशती का पाठ पूरा होने पर पहले नवार्णजप करके फिर देवीसूक्त के पाठ का विधान है; अतः यहाँ भी नवार्ण-विधि उद्धृत की जाती है। सब कार्य पहले की ही भाँति होंगे। ॥विनियोगः॥ श्री-गणपतिर्-जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्ण-मन्त्रस्य ब्रह्मा-विष्णु-रुद्रा ऋषयः,  गायत्री-ऊष्णिग-अनुष्टुभश्-छ न्दांसि, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः। ॥ऋष्यादिन्यासः॥ ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ऋषिभ्यो नमः, शिरसि। गायत्री-ऊष्णिग-अनुष्टुप्-छन्दोभ्यो  नमः, मुखे  महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-देवताभ्यो नमः, हृदि। ऐं बीजाय नमः, गुह्ये। ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः। क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ। "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" - इति मूलेन करौ संशोध्य- ॥करन्यासः॥ ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः। ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः। ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। ॥हृदयादिन्यासः॥ ॐ ऐं हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे स्...

09. नवम् नवरात्र पूजा || सिद्धिदात्री चरित + द्वादश व त्रयोदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

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09. नवम् नवरात्र पूजा || सिद्धिदात्री चरित || एवं ||  द्वादश व त्रयोदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती) नवम सिद्धिदात्री दुर्गा के नवम स्वरूप को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में नवें दिन अर्थात नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की उपासना का विधान है। सभी प्रकार की सिद्धी देने के कारण ये देवी सिद्धिदात्री कहलाती हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इनकी उपासना से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। देवी पुराण में भी एक स्थान पर वर्णन आता है कि भगवान शिव ने भी इन्ही की कृपा से सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।  इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान संसार में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। माता सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। ये कमल के पुष्प पर आसीन होती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प हैं। नवरात्रि पूजन के नवे दिन इनकी पूजा की जाती है। इनकी पूजा के बिना सारी पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि नौ दिनरात के...

08. अष्टम् नवरात्र पूजा || महागौरी चरित + दशम् व एकदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

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08. अष्टम् नवरात्र पूजा  || महागौरी चरित ||  एवं || दशम् व एकदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)|| अष्टम महागौरी दुर्गा के अष्टम स्वरूप को महागौरी के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में आठवें दिन अर्थात  अष्टमी को माँ महागौरी की उपासना का विधान है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर (श्वेत) है। इन्हें ब्रह्माण्ड़ की सबसे सुन्दर स्त्री अर्थात विश्वसुंदरी बताया गया है। इसी कारण इन्हे महागौरी कहा जाता है। उनकी गौरता की तुलना शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से की गई है। अष्टवर्षा भवेदगौरी के अनुसार पुराणादि में इनकी आयु आठ वर्ष बतायी गई है। तीन नेत्र वाली इन देवी के वस्त्र और आभूूषण भी श्वेत तथा दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हैं। इसलिए इन्हे श्वेताम्बरधरा भी कहते हैं। इनकी भी चार भुजाएं है अर्थात ये भी  चतुर्भुजाधारी हैं। इनका ऊपरी दाहिना हाथ अभय मुद्रायुक्त तथा नीचे के दाहिने हाथ त्रिशूल युक्त है। इनके ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला बाया हाथ वर की शांत मुद्रा में शोभित हो रहा है। इनका वाहन भी वृषभ है। इसलिए इनको भी वृषभारूढ़ा कहते हैं। इनकी उपासना से कोई कार्य असंभव नहीं...