09. नवम् नवरात्र पूजा || सिद्धिदात्री चरित + द्वादश व त्रयोदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

09. नवम् नवरात्र पूजा || सिद्धिदात्री चरित || एवं || 
द्वादश व त्रयोदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

नवम सिद्धिदात्री

दुर्गा के नवम स्वरूप को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में नवें दिन अर्थात नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की उपासना का विधान है। सभी प्रकार की सिद्धी देने के कारण ये देवी सिद्धिदात्री कहलाती हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इनकी उपासना से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। देवी पुराण में भी एक स्थान पर वर्णन आता है कि भगवान शिव ने भी इन्ही की कृपा से सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। 

इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान संसार में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। माता सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है। ये कमल के पुष्प पर आसीन होती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प हैं। नवरात्रि पूजन के नवे दिन इनकी पूजा की जाती है। इनकी पूजा के बिना सारी पूजा अधूरी मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि नौ दिनरात के पूजा पाठ का फल ये ही प्रदान करती हैं। इनकी आराधना से निर्वाण चक्र जाग्रत हो जाता है। यदि व्यक्ति चाहे तो निर्वाण प्राप्त कर सकता है। देवी सिद्धिदात्री का मंत्र ‘ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ सिद्धिदात्री दैव्यै नमः।’ है। 

इनका साधक सदगुणी, वीर, सौम्य एवं विनम्र होता है। उसके नेत्र, मुख तथा संपूर्ण शरीर में दिव्य चमक देखी जा सकती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि देवी के ऐसे साधक के शरीर से भी माता के शरीर के समान ही दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण विकरित होता रहता है। जो साधारण चक्षुओं से दिखालाई नहीं देता परंतु साधक के संपर्क में आने वाले लोग इसका अनुभव करते हैं। उन्हे आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। वे शांति और सुख का अनुभव करते हैं। इनके साधक के स्वर में आलौकिक माधुर्य होता है।

माँ सिद्धिदात्री के साधक को चाहिए कि वे अपने मन, वचन, कर्म एवं शरीर से पूर्णतः शुद्व एवं पवित्र रहकर इनकी उपासना व आराधना में तत्पर रहें। हमें निरंतर माता के पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होना चाहिए। उनकी आराधना इहलोक और परलोक दोनों में सदगति देने वाली तथा समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त करके परमपद का अधिकारी बनाने वाली है।

माँ सिद्धिदात्री मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

माँ सिद्धिदात्री ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घ-कृत शेखराम्।
कमल-स्थितां चतुर्-भुजा सिद्धी-दात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्ण-वर्णा निर्वाण-चक्र-स्थितां नवम् दुर्गा त्रि-नेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धी-दात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परि-धानां मृदु-हास्या नाना-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्न-कुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लव-धरां कातं कपोला पीन-पयो-धराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्न-नाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

कंचन-आभा शंख-चक्र-गदा-पद्म-धरा मुकुट-उज्वलो।
स्मेर-मुखी शिव-पत्नी सिद्धि-दात्री नमो-अस्तुते॥
पटाम्बर परि-धानां नाना-अलंकारं भूषिता।
नलि-स्थितां नल-नार्क्षी सिद्धी-दात्री नमोअस्तुते॥
परम-आनंदमयी देवी पर-ब्रह्म परमात्मा।
परम-शक्ति, परम-भक्ति, सिद्धि-दात्री नमोअस्तुते॥
विश्व-कर्ती, विश्व-भर्ती, विश्व-हर्ती, विश्व-प्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्ति-मुक्ति-कारिणी भक्त-कष्ट-निवारिणी।
भव सागर तारिणी सिद्धि-दात्री नमोअस्तुते॥
धर्म-अर्थ-काम प्रदायिनी महा-मोह वि-नाशिनी।
मोक्ष-दायिनी सिद्धी-दायिनी सिद्धि-दात्री नमोअस्तुते॥

माँ सिद्धिदात्री कवच

ओंकार-पातु शीर्षो माँ ऐं बीजं माँ हृदयो।
हीं बीजं सदा-पातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीज-पातु क्लीं बीजं माँ नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्-प्रसूत्यै माँ सर्व वदनो।।

माँ सिद्धिदात्री बीज मंत्र:-

श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:

बीज मंत्र का जाप एक माला अर्थात 108 बार करे । माँ के बीज मंत्रो का जाप करने से आपके सर्व मनोरथ पूर्ण होते है ।

माँ सिद्धिदात्री भोग

माँ सिद्धिदात्री को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं जैसे- हलवा, चना-पूरी, खीर और पुए और फिर उसे गरीबों को दान करें। इससे जीवन में हर सुख-शांति मिलती है।




बारहवां अध्याय - ' देवीमाहाम्य में फलस्तुति '
(श्री दुर्गा सप्तशती)  
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्‍चक्रगदासिखेटविशिखांश्‍चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

।। ध्यान।।

मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवीका ध्यान करता (करती) हूँ, उनके श्रीअंगोकी प्रभा बिजलीके समान है। वे सिंहके कंधेपर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं। हाथोंमें तलवार और ढाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी सेवामें खड़ी हैं। वे अपने हाथोंमें चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं। उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथेपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करती हैं।

“ॐ” देव्युवाच॥१॥
एभिः स्तवैश्‍च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥२॥
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्॥४॥
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्॥५॥
शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः।
न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति॥६॥
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत्॥७॥
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम॥८॥
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्‌नित्यमायतने मम।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम्॥९॥
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च॥१०॥

देवी बोलीं- 
देवताओ ! जो एकाग्रचित होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा ध्यान करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर कर दूंगी। जो मधु-कैटभका नाश, महिषासुरका वध, शुम्भ-निशुम्भके संहार के प्रसंग का पाठ करेंगे। तथा अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को जो एकाग्रचित हो भक्तिपूर्वक मेरा माहात्म्य का श्रवण करेंगे – उन्हें कोई पाप नहीं छू सकेगा। उन पर पापजनित आपत्तियां भी नहीं आएंगी। उनके घर में दरिद्रता नहीं होगी तथा उनको कभी प्रेमीजनों के विछोह का कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा।

इतना ही नहीं, उन्हें शत्रु से, लुटेरों से, राजा से, शस्त्र से, अग्नि से तथा जलराशि से भी कभी भय नहीं होगा। इसलिए सबको एकाग्रचित होकर भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य को सदा पढना और सुनना चाहिए। यह परम कल्याणकारक है। मेरा माहात्म्य महामारीजनित समस्त उपद्रवों एवं तीनों प्रकार के उत्पातोंको शांत करने वाला है। मेरे जिस मंदिर में प्रतिदिन विधिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य का पाठ किया जाता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती। वहां सदा ही मेरा सन्निधान  (निवास) बना रहता है। पूजा, होम तथा महोत्सव के अवसरों पर मेरे इस चरित्र का पूरा-पूरा पाठ और हवन करना चाहिए।

जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्॥११॥
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥१२॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥१३॥
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्॥१४॥
रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्॥१५॥
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम॥१६॥
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्‍च दारुणाः।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते॥१७॥
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्।
संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्॥१८॥
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्॥१९॥
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्‍च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः॥२०॥

ऐसा करने पर मनुष्य विधि को जानकर या बिना जाने भी मेरे लिए जो पूजा या होम आदि करेगा, उसे मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण करूंगी। शरद काल में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसर पर जो मेरे इस माहात्म्य को भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मेरे इस माहात्म्य, मेरे प्रादुर्भाव की सुंदर कथाएं तथा युद्ध में किए हुए मेरे पराक्रम सुनने से मनुष्य निर्भय हो जाता है। मेरे माहात्म्य का श्रवण करने वाले पुरुषों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं, उहें कल्याण की प्राप्ति होती तथा उनका कुल आनंदित रहता है।

सर्वत्र शांति-कर्म में, बुरे स्वप्न दिखायी देने पर तथा ग्रहजनित भयंकर पीड़ा उपस्थित होने पर मेरा माहात्म्य श्रवण करना चाहिए। इससे सब विध्न तथा भयंकर ग्रह-पीड़ाएं शांत हो जाती हैं और मनुष्यों द्वारा देखा हुआ दु:स्वपन शुभ स्वपन में परिवर्तित हो जाता है। बालग्रहों से आक्रांत हुए बालकों के लिए यह माहात्म्य शांतिकारक है। मनुष्योंके संगठन में फूट होने पर यह मित्रता कराने वाला होता है। 

यह माहात्म्य समस्त दुराचारियों के बल का नाश कराने वाला है। इसके पाठमात्र से राक्षसों, भूतों और पिशाचों का नाश हो जाता है। मेरा यह सब माहात्म्य मेरे सामीप्य की प्राप्ति कराने वाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गंध आदि से पूजन करने से,

विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।
अन्यैश्‍च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या॥२१॥
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते।
श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति॥२२॥
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम्॥२३॥
तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते।
युष्माभिः स्तुतयो याश्‍च याश्‍च ब्रह्मर्षिभिःकृताः॥२४॥
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः॥२५॥
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः॥२६॥
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे॥२७॥
पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा॥२८॥
स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात्।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा॥२९॥
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्‍चरितं मम॥३०॥

ब्राह्मण भोज से, होम से, प्रतिदिन अभिषेक करने से, नाना प्रकार के भोगों के अर्पण से तथा दान आदि से एक वर्ष तक मेरी आराधना से मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार श्रवण करनेमात्रसे हो जाती है। 

यह माहात्म्य श्रवण करने पर पापोंको हर लेता है और आरोग्यता प्रदान करता है। मेरे प्रादुर्भाव का कीर्तन, समस्त भूतों से रक्षा करता है तथा मेरा युद्धविषयक चरित्र दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाला है। इसके श्रवण करनेपर मनुष्यों को शत्रु का भय नहीं रहता। देवताओ ! तुमने और ब्रह्मर्षियों ने जो मेरी स्तुतियां की हैं। तथा ब्रह्माजी ने जो स्तुतियां की हैं, वे सभी कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। वन में, सुने मार्ग में (वीरान मार्ग में), दावानल से घिर जाने पर, निर्जन स्थान में, लुटेरों के दांव में पड़ जाने पर या शत्रुओं से पकड़े जाने पर, अथवा जंगल में सिंह, व्याघ्र या जंगली हाथियों के पीछा करने पर (मेरे चरित्र का स्मरण करने से कष्टों से रक्षा होती है) कुपित राजा के आदेशसे वध या बंधन के स्थान में ले जाए जाने पर, महासागरमें नावपर बैठनेके बाद भारी तूफान से नाव के डगमग होने पर, और अत्यंत भयंकर युद्ध में शस्त्रों का प्रहार होनेपर, वेदना से पीडि़त होने पर, अथवा सभी भयानक बाधाओं के उपस्थित होने पर जो मेरे चरित्र का स्मरण करता है, वह संकटमुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि हिंसक जंतु नष्ट हो जाते हैं तथा लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले पुरुष से दूर भागते हैं।

ऋषिरुवाच॥३१॥
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा॥३२॥
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत।
तेऽपि देवा निरातङ्‌काः स्वाधिकारान् यथा पुरा॥३३॥
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः।
दैत्याश्‍च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि॥३४॥
जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः॥३५॥
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्॥३६॥
तयैतन्मोह्यते विश्‍वं सैव विश्‍वं प्रसूयते।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति॥३७॥
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्‍वर।
महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया॥३८॥
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी॥३९॥
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे।
सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते॥४०॥
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्‍च मतिं धर्मे गतिं शुभाम्॥ॐ॥४१॥

ऋषि कहते हैं – 
ऐसा कहकर प्रचंड पराक्रम वाली भगवती चंडिका सब देवताऒं के देखते-देखते अंतर्धान हो गईं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओं के मारे जाने से निर्भय हो पहले की ही भांति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने-अपने अधिकार का पालन करने लगे। संसार का विध्वंस करने वाले महाभयंकर पराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भ के युद्ध में देवी द्वारा मारे जाने पर शेष दैत्य पाताल लोक में चले आए।

राजन् ! इस प्रकार भगवती अम्बिका देवी नित्य होती हुई भी पुन:-पुन: प्रकट होकर जगत की रक्षा करती हैं। वे ही इस विश्व को मोहित करतीं, वे ही जगत को जन्म देतीं तथा वे ही प्रार्थना करने पर संतुष्ट हो समृद्धि प्रदान करती हैं। 

राजन ! महाप्रलय के समय महामारी का स्वरूप धारण करने वाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। वे ही समय-समय पर महामारी का रूप बनाती हैं और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं। 

वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतों की रक्षा करती हैं। मनुष्यों के अभ्युदयके समय वे ही घर में लक्ष्मी के रूप में स्थित हो उन्नति प्रदान करती हैं और वे ही अभाव के समय दरिद्रता बनकर विनाश का कारण होती हैं। पुष्प, धूप और गंध आदि से पूजन करके उनकी स्तुति करने पर वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा उत्तम गति प्रदान करती हैं।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेयपुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवीमाहाम्य में फलस्तुति नामक बारहवां अध्याय पूरा हुआ।


तेरहवां अध्याय - ' सुरथ और वैश्य को वरदान '
(श्री दुर्गा सप्तशती) 
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्।
पाशाङ्‌कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥

।। ध्यान।।

जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवादेवीका मैं ध्यान करता (करती) हूँ।

“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।
एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत्॥२॥
विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया।
तया त्वमेष वैश्‍यश्‍च तथैवान्ये विवेकिनः॥३॥
मोह्यन्ते मोहिताश्‍चैव मोहमेष्यन्ति चापरे।
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्‍वरीम्॥४॥
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥५॥

मेधा ऋषि कहते हैं- 
राजन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया जो इस जगत को धारण करती हैं उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है। वे ही विद्या, उत्पन्न करती है। भगवान विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य विवेकीजन मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। महाराज ! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वे ही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।

मार्कण्डेय उवाच॥६॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः॥७॥
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्।
निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च॥८॥
जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने।
संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः॥९॥
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।
तौ तस्मिन पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्॥१०॥
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।
निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ॥११॥
ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्।
एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः॥१२॥
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका॥१३॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – 
मेधा मुनि के ये वचन सुनकर राजा सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया। वे अत्यंत ममता और राज्य के छिन जाने से बहुत खिन्न हो चुके थे। 

महामुने ! इसलिए विरक्त होकर राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए और वे जगदम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे। वे वैश्य उत्तम देवीसूक्त का जप करते हुए तपस्या में प्रवृत हुए। वे दोनों नदी के तटपर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा उनकी आराधना करने लगे।

उन्होंने पहले तो आहार को धीरे-धीरे कम किया। फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाकर एकाग्रता पूर्वक उनका चिंतन आरम्भ किया। वे दोनों अपने शरीर के रक्त से प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्ष तक संयमपूर्वक आराधना करते रहे। इसपर प्रसन्न होकर जगतको धारण करनेवाली चंडिका देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा –

देव्युवाच॥१४॥
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत्॥१५॥

देवी बोली – 
“राजन् ! तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य! तुम लोग जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे मांगो। मैं संतुष्ट हूं, अत: तुम्हें वह सब कुछ दूंगी।

मार्कण्डेय उवाच॥१६॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्‍यन्यजन्मनि।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥१७॥
सोऽपि वैश्‍यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्‌गविच्युतिकारकम्॥१८॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – 
तब राजा ने दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य मांगा तथा इस जन्म में भी शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुन: अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान मांगा। वैश्य का चित्त संसार की ओर से खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान थे अत: उस समय उन्होंने तो ममता और अहंता रूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान मांगा।

देव्युवाच॥१९॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान्॥२०॥
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति॥२१॥
अब वहां तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।
मृतश्‍च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः॥२२॥
सावर्णिको नाम* मनुर्भवान् भुवि भविष्यति॥२३॥
वैश्‍यवर्य त्वया यश्‍च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥

देवी बोलीं – 
राजन् ! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुओं को मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। फिर मृत्यु के पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान (सूर्य) के अंश से जन्म लेकर इस पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से विख्यात होओगे। वैश्यवर्य ! तुमने भी जिस वर को मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है, उसे देती हूं। तुम्हें मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा।

मार्कण्डेय उवाच॥२६॥
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम्॥२७॥
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता।
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः॥२८॥
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥२९॥
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥क्लीं ॐ॥

मार्कंडेयजी कहते हैं – 
इस प्रकार उन दोनों को मनोवांछित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अंतर्धान हो गईं। इस तरह देवी से वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्य से जन्म ले सावर्णिक नामक मनु होंगे।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवी माहाम्य में सुरथ और वैश्य को वरदान नामक तेरहवां अध्याय पूरा हुआ।

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
8/8/14/10/2021

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