08. अष्टम् नवरात्र पूजा || महागौरी चरित + दशम् व एकदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

08. अष्टम् नवरात्र पूजा 
|| महागौरी चरित || 
एवं
|| दशम् व एकदश अध्याय (दुर्गा सप्तशती)||

अष्टम महागौरी


दुर्गा के अष्टम स्वरूप को महागौरी के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि में आठवें दिन अर्थात  अष्टमी को माँ महागौरी की उपासना का विधान है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर (श्वेत) है। इन्हें ब्रह्माण्ड़ की सबसे सुन्दर स्त्री अर्थात विश्वसुंदरी बताया गया है। इसी कारण इन्हे महागौरी कहा जाता है। उनकी गौरता की तुलना शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से की गई है। अष्टवर्षा भवेदगौरी के अनुसार पुराणादि में इनकी आयु आठ वर्ष बतायी गई है। तीन नेत्र वाली इन देवी के वस्त्र और आभूूषण भी श्वेत तथा दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हैं। इसलिए इन्हे श्वेताम्बरधरा भी कहते हैं। इनकी भी चार भुजाएं है अर्थात ये भी  चतुर्भुजाधारी हैं। इनका ऊपरी दाहिना हाथ अभय मुद्रायुक्त तथा नीचे के दाहिने हाथ त्रिशूल युक्त है। इनके ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला बाया हाथ वर की शांत मुद्रा में शोभित हो रहा है। इनका वाहन भी वृषभ है। इसलिए इनको भी वृषभारूढ़ा कहते हैं। इनकी उपासना से कोई कार्य असंभव नहीं रहता।

पर्वतराज के घर पार्वती रूप में जन्म लेने के उपरांत इन देवी ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की जिससे इनका शरीर काला पड़ गया। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से मलमल कर धोया तो वह कृशकाय शरीर विधुत के समान कांतिमान गौर हो गया, तभी से इनका नाम गौरी या महागौरी पड़ा और ये विश्व की सबसे सुंदर स्त्री के रूप में जानी गई। इनकी आराधना से सोमचक्र जाग्रत होता है। देवी महागौरी का मंत्र ‘ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ महागौरी दैव्यै नमः।’ है। इनकी पूजा व उपासना कल्याणकारी तथा आलौकिक सिद्धियों को देने वाली हैं।

 इनकी उपासना सद्यफल देने वाली है। इनकी उपासना सभी कल्मषों को धोकर सभी पापों को नष्ट कर देती है। इनके साधक के पास पाप व संताप भटकते भी नहीं और साधक अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है। ये साधक की वृत्तियों को असत् से सत् की ओर मोड़कर उसके मुक्ति पाने के मार्ग को सुलभ बनाती है।

माँ महागौरी मंत्र

श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बरा-धरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्-महादेव-प्रमोद-दा।।
या देवी सर्व-भू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ महागौरी ध्यान


वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घ-कृत शेखराम्।
सिंहा-रूढ़ा चतुर्-भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥
पूर्णन्दु निभां गौरी सोम-चक्र-स्थितां अष्टमं महागौरी त्रि-नेत्राम्।
वरा-भीति-करां त्रिशूल डमरू-धरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परि-धानां मृदु-हास्या नाना-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्न-कुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वा-धरां कातं कपोलां त्रै-लोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदन-गंध-लिप्ताम्॥

माँ महागौरी स्तोत्र


सर्व-संकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदाय-नीम्।
ज्ञान-दा चतुर्-वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्ति-दात्री धन धान्य प्रदीय-नीम्।
डमरू-वाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्।।
त्रै-लोक्य-मंगल त्वंहि ताप-त्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्य-मयी महा-गौरी प्रणमाम्यहम्॥

माँ महागौरी कवच


ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदा-पातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्व-वदनो॥

माँ महागौरी बीज मंत्र :-

श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:


बीज मंत्र का जाप एक माला अर्थात 108 बार करे । माँ महागौरी के आशीर्वाद से व्यक्ति अभय वरदान को प्राप्त करता है । भूत, पिशाच रोगों से मुक्त हो जाता है।

माँ महागौरी भोग

नारियल का भोग लगाएं। नारियल को सिर से घुमाकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। मान्यता है कि ऐसा करने से आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।


दसवाँ अध्याय - ' शुम्भ-वध ' 
(श्री दुर्गा सप्तशती)  
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
नेत्रां धनुश्शरयुताङ्‌कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्‍च दधतीं शिवशक्तिरूपां
कामेश्‍वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्॥

।। ध्यान।।
मैं मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीका हृदयमें चिन्तन करता (करती) हूँ। वे तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि ये ही तीन, उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर हाथोंमें धनुष-बाण, अंकुश, पाश और शूल धारण किये हुए हैं ।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमः
मैं चंडिका देवी को नमस्कार करता हूं।

“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
निशुम्भं निहतं दृष्ट्‌वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥२॥
बलावलेपाद्दुष्टे* त्वं मा दुर्गे गर्वमावह।
अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी॥३॥

ऋषि कहते हैं- 
हे राजन् ! अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुम्भ ने कुपित होकर कहा – “दुष्ट दुर्गे ! तू बल के अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी हुई है, किंतु दूसरी स्त्रियोंके के बल का सहारा लेकर लड़ती है।”

देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः*॥५॥
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका॥६॥

देवी बोलीं – 
“ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूं। इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अत: मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं। तदनंतर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियां अंबिका देवी के शरीर में लीन हो गईं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं।

देव्युवाच॥७॥
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव॥८॥

देवी बोलीं – 
मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से अनेक रूपों में यहां उपस्थित हुई थी। उन सब रूपों को मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूं। तुम भी स्थिर हो जाऒ।

ऋषिरुवाच।।९॥
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम्॥१०॥
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्‍चैव दारुणैः।
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम्॥११॥
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः॥१२॥
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्‍वरी।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहु*ङ्‌कारोच्चारणादिभिः॥१३॥
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः।
सापि* तत्कुपिता देवी धनुश्‍चिच्छेद चेषुभिः॥१४॥
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम्॥१५॥
ततः खड्‌गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत्।
अभ्यधावत्तदा* देवीं दैत्यानामधिपेश्‍वरः॥१६॥
तस्यापतत एवाशु खड्‌गं चिच्छेद चण्डिका।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्‍चर्म चार्ककरामलम्*॥१७॥
हताश्‍वः स तदा दैत्यश्‍छिन्नधन्वा विसारथिः।
जग्राह मुद्‌गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः॥१८॥
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्‌गरं निशितैः शरैः।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान्॥१९॥
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्‌गवः।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत्॥२०॥

ऋषि कहते हैं – 
तदनंतर देवी और शुम्भ दोनों में सब देवताओं तथा दानवों के देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया। बाणों की वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रों के प्रहार के कारण उन दोनों का युद्ध सब लोगों के लिये बड़ा भयानक प्रतीत हुआ। उस समय अम्बिका देवी ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उसे दैत्यराज शुम्भ ने उनके निवारक अस्त्रों द्वारा काट डाला।

इसी प्रकार शुम्भ ने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये; उन्हें परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार शब्दके उच्चारण अदिद्वारा खेल-खेल में ही नष्ट कर डाला। तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को आच्छादित कर दिया। यह देख क्रोध में भरी हुई उन देवीने भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला। 

धनुष कट जाने पर फिर दैत्यराज ने शक्ति हाथ में ली किंतु देवी ने चक्र से उसके हाथ की शक्ति को भी काट गिराया। तपश्चात दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने सौ चांद वाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथ में ले उस समय देवी पर धावा किया।

उसके आते ही चंडिका ने अपने धनुष से छोड़े हुए तीखे बाणों द्वारा उसकी सूर्य किरणों के समान उज्वल ढाल और तलवार को तुरंत काट दिया। फिर उस दैत्य के घोड़े और सारथी मारे गए। धनुष तो पहले ही कट चुका था, अब उसने अम्बिका को मारने के लिये उद्यत हो भयंकर मुदगर हाथ में लिया। उसे आते देख देवी ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका मुद्गर भी काट डाला, तिस पर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेग से देवी की ओर झपटा। उस दैत्यराज ने देवी की छाती में मुक्का मारा, तब उन देवी ने भी उसकी छाती में एक थप्पड़ जड़ दिया।

तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः॥२१॥
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका॥२२॥
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्‍चण्डिका च परस्परम्।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम्॥२३॥
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले॥२४॥
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः*।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया॥२५॥

देवी का थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु पुन: सहसा पूर्ववत उठकर खड़ा हो गया। फिर वह उछला और देवी को ऊपर ले जाकर आकाश में खड़ा हो गया। तब चंडिका आकाश में भी बिना किसी आधार के ही शुम्भ के साथ युद्ध करने लगीं। उस समय दैत्य और चंडिका आकाश में एक-दूसरे से लड़ने लगे। उनका वह युद्ध सिद्ध और मुनियों को विस्मृत करने वाला हुआ। फिर अम्बिका ने शुम्भ के साथ बहुत देर तक युद्ध करने के पश्चात उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया। पटके जाने पर पृथ्वी पर आने के बाद वह दुष्टत्मा दैत्य पुन: चण्डिका का वध करने के लिए उनकी ओर बड़े वेग से दौड़ा।

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्‍वरम्।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि॥२६॥
स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम्॥२७॥
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः॥२८॥
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते॥२९॥
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः॥३०॥
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्‍चाप्सरोगणाः।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः॥३१॥
जज्वलुश्‍चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः॥ॐ॥३२॥

तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के शूल की धार से घायल होने पर उसके प्राण-पखेरू उड़ गए और वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को कंपाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा। तदंतर उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा।

पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शांत हो गए तथा उस दैत्य के मारे जाने पर नदियाँ भी ठीक मार्ग से बहने लगीं। उस समय शुम्भ की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण देवताओं का हृदय हर्ष से भर गया और गंधर्वगण मधुर गीत गाने लगे। दूसरे गंधर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई। अग्निशाला की बुझी हुई आग अपने-आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाओं के भयंकर शब्द शांत हो गए।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवीमाहाम्य में शुम्भ-वध नामक दसवां अध्याय पूरा हुआ।


ग्यारहवां अध्याय - ' देवी स्तुति '
(श्री दुर्गा सप्तशती) 
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्‌गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्‌कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥

।। ध्यान।।
मैं भुवनेश्वरी देवीका ध्यान करता (करती) हूँ । उनके श्रीअंगोकी आभा प्रभातकालके सूर्यके समान है और मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है और तीन नेत्रोंसे युक्त हैं। उनके मुखपर मुस्कानकी छटा छायी रहती है और हाथ वरद, अंकुश, पाश एवं अभय-मुद्रा से शोभा पाते हैं।

ऊं नमश्चंडिकायैः नमः

“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः॥२॥
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य॥३॥
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत-दाप्यायते कृत्स्नमलङ्‌घ्यवीर्ये॥४॥
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्‍वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥५॥

ऋषि कहते हैं- 
देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भ के मारे जाने पर इंद्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुखकमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएं भी जगमगा उठी थीं।

देवता बोले – 
शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि ! हम पर प्रसन्न हों। सम्पूर्ण जगत की माता ! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि ! विश्व की रक्षा करो। देवि ! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो।

तुम इस जगत का एकमात्र आधार हो क्योंकि पृथ्वी रूप में तुम्हारी ही स्थिति है। देवि ! तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है। तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो। तुम अनंत बल सम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्व की कारण भूता परा माया हो। देवी! तुमने इस समस्त जगत को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी को मोक्ष की प्राप्ति कराती हो।

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।देवि
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥६॥
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥७॥
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥८॥
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि।
विश्‍वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते॥९॥
सर्वमङ्‌गलमंङ्‌गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१०॥

देवि ! सम्पूर्ण विद्याएं तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत में जितनी स्त्रियां हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियां हैं। जगदम्बा ! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तुति करने योग्य पदार्थों से परे एवं परा वाणी (परमबुद्धि स्वरूपा) हो।

जब तुम सर्वस्वरूपा देवी स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हो, तब इसी रूप में तुम्हारी स्तुति हो गई। तुम्हारी स्तुति के लिए इससे अच्छी उक्तियां और क्या हो सकती हैं? बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी देवि ! तुम्हें नमस्कार है। कला, काष्ठा आदि के रूप से क्रमश: परिणाम - (अवस्था-परिवर्तन) की ओर ले जाने वाली तथा विश्व का उपसंहार करने में समर्थ नारायणी! तुम्हें नमस्कार है। नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥११॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१२॥
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१३॥
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि।
माहेश्‍वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते॥१४॥
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते॥१५॥
शङ्‌खचक्रगदाशाङ्‌र्गगृहीतपरमायुधे।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१६॥
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१७॥
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥१८॥
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले।
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२०॥

तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणोंका आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

शरण में आए हुए दीनों एवं पीडि़तों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवी ! तुम्हें नमस्कार है।

नारायणि ! तुम ब्रह्माणी का रूप धारण करके हंसों से जुते हुए विमान पर बैठती तथा कुश-मिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हें नमस्कार है।
 
माहेश्वरी रूप से त्रिशूल, चंद्रमा एवं सर्प को धारण करने वाली तथा महान वृषभ की पीठ पर बैठने वाली नारायणी देवी ! तुम्हें नमस्कार है। 

मोरों से घिरी रहने वाली तथा महाशक्ति धारण करने वाली कौमारी रूपधारिणी निष्पापे नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है।

शङ्ख, चक्र, गदा और धनुषरूप उत्तम आयुधों को धारण करने वाली वैष्णवी शक्ति रूपा नारायणि ! तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार है।

हाथ में भयानक महाचक्र लिए और दाढ़ों पर धरती को उठाए वराही रूपधारिणी कल्याणमयी नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

भयंकर नृसिंहरूप से दैत्यों के वध के लिए उद्योग करने वाली तथा त्रिभुवन की रक्षा में संलग्न रहने वाली नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

मस्तक पर किरीट और हाथ में महावज्र धारण करने वाली, सहस्र नेत्रों के कारण उद्दीप्त दिखायी देने वाली और वृत्रासुरके प्राण हरने वाली इंद्रशक्तिस्वरूपा नारायणी देवि ! तुम्हें नमस्कार है।
 
शिवदूती रूपसे दैत्यों की महती सेना का संहार करनेवाली, भयंकर रूप धारण तथा विकट गर्जना करनेवाली नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है।

दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥२१॥
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे।
महारात्रि महाऽविद्ये नारायणि नमोऽस्तु ते॥२२॥
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२३॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥२४॥
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥२५॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥२६॥
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव॥२७॥
असुरासृग्वसापङ्‌कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः।
शुभाय खड्‌गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्॥२८॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥२९॥
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य
धर्मद्विषां देवि महासुराणाम्।
रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्तिं
कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या॥३०॥

दाढ़ों के कारण विकराल मुखवाली मुंडमालाओं से विभूषित मुण्डमर्दिनी चामुण्डारूपा नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा तथा महारात्रि नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

मेधा, सरस्वती, श्रेष्ठा, ऐश्वर्यरूपा, पार्वती, महाकाली, नियता तथा ईशा-सबकी अधीश्वरी रूपिणी नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है। 

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि ! सब भयों से हमारी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। 

हे कात्यायनी ! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख, सब प्रकारके भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है।

भद्रकाली ! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होने वाला, अत्यंत भयंकर और समस्त असुरों का संहार करने वाला तुम्हारा त्रिशूल भयसे हमें बचाए। तुम्हें नमस्कार है। 

देवि ! जो अपनी ध्वनि से समूचे जगत को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट करता है, तुम्हारा वह घंटा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मों से रक्षा करती है।
 
चण्डिके ! तुम्हारे हाथों में सुशोभित खड्ग, जो असुरों के रक्त और चर्बीसे चर्चित है, हमारा मंगल करे। हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। 

देवि ! तुम प्रसन्न होनेपर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं। 

देवि ! अम्बिके ! तुमने अपने स्वरूप को अनेक भागों में विभक्त करके नाना प्रकार के रूपों से जो इस समय इन धर्मद्रोही महादैत्यों का संहार किया है, वह सब दूसरी कौन कर सकती थी?

विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे-
ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या।
ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे
विभ्रामयत्येतदतीव विश्‍वम्॥३१॥
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्‍च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्‍वम्॥३२॥
विश्‍वेश्‍वरि त्वं परिपासि विश्‍वं
विश्‍वात्मिका धारयसीति विश्‍वम्।
विश्‍वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्‍वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥३३॥
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते-
र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्‍च महोपसर्गान्॥३४॥
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्‍वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्‍ये लोकानां वरदा भव॥३५॥

विद्याओं में, ज्ञानको प्रकाशित करने वाले शास्त्रोंमें तथा अदिवाक्यों में (वेदों में) तुम्हारे सिवा और किसका वर्णन है? 

जहां राक्षस, भयंकर विषैले सर्प, शत्रुगण, लुटेरों की सेना और दावानल हो वहां, तथा समुद्र के बीच में भी साथ रहकर तुम विश्व की रक्षा करती हो। 

विश्वेश्वरि ! तुम विश्व का पालन करती हो। विश्वरूपा हो, इसलिए संपूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान विश्वनाथ की भी वंदनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देने वाले होते हैं। 

देवि ! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत का पाप नष्ट कर दो। पापों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले महामारी आदि बड़े-बड़े उपद्रवों को शीघ्र दूर करो। 

विश्व की पीड़ा दूर करने वाली देवि ! हम तुम्हारे चरणों पर पड़े हैं, हम पर प्रसन्न होओ। त्रिलोक निवासियों की पूजनीया परमेश्वरि ! सब लोगों को वरदान दो।

देव्युवाच॥३६॥
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्॥३७॥

देवी बोलीं – 
देवताओ ! मैं वर देने को तैयार हूं। तुम्हारे मन में जिसकी इच्छा हो, वह वर मांग लो। संसार के लिए उस उपकारक वर को मैं अवश्य दूंगी।

देवा ऊचुः॥३८॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥३९॥

देवता बोले- 
सर्वेश्वरि ! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।

देव्युवाच॥४०॥
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे।
शुम्भो निशुम्भश्‍चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥४२॥
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥
भक्षयन्त्याश्‍च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥
भूयश्‍च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि।
मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
पुनश्‍चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥

देवी बोलीं - 
देवताओ ! वैवस्वत मन्वंतर के अठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे। तब मैं नंदगोपके घर में उनकी पत्नी यशोदाके गर्भ से अवतीर्ण हो विंध्यांचल में जाकर रहूंगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूंगी।
 
फिर अत्यंत भयंकर रूप से पृथ्वी पर अवतार लेकर मैं वैप्रचिति नामक दानवों का वध करूंगी। उन भयंकर महादैत्यों को भक्षण करते समय मेरे दांत अनारके फूल की भांति लाल हो जाएंगे। तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य सदा मेरी स्तुति करते हुए मुझे 'रक्तदंतिका' कहेंगे।

फिर जब पृथ्वी पर सौ वर्षों के लिए वर्षा रुक जाएगी और पानी का अभाव हो जाएगा, उस समय मुनियों के स्तवन करने पर मैं पृथ्वी पर अयोनिजारूप में प्रकट होऊंगी और सौ नेत्रों से मुनियों को देखूंगी। अत: मनुष्य 'शताक्षी' नाम से मेरा कीर्तन करेंगे। 

देवताओ ! उस समय मैं अपने शरीर से उपन्न हुए शाकों द्वारा समस्त संसार का भरण-पोषण करूंगी। जब तक वर्षा नहीं होगी, तब तक वे शाक ही सबके प्राणों की रक्षा करेंगे। ऐसा करने के कारण पृथ्वी पर 'शाकम्भरी' के नाम से मेरी ख्याति होगी। उसी अवतार में मैं दुर्गम नामक महादैत्य का वध भी करूंगी।

रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्।
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्‌पदम्।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥

इससे मेरा नाम 'दुर्गा देवी' के रूप से प्रसिद्ध होगा।

फिर मैं जब भीम रूप धारण करके मुनियों की रक्षाके लिए हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण करूंगी, उस समय सब मुनि भक्ति से नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे। तब मेरा नाम 'भीमादेवी' के रूप में विख्यात होगा। 

जब अरुण नामक दैत्य तीनों लोकों में भारी उपद्रव मचाएगा तब-तब अवतार लेकर मैं दुष्टोंका संहार करूंगी। तब मैं तीनों लोकों का हित करने के लिए छ: पैरोंवाले असंख्य भ्रमरोंका रूप धारण करके उस महादैत्य का वध करूंगी। उस समय सब लोग 'भ्रामरी' के नाम से मेरी स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी तब-तब अवतार लेकर, मैं दुष्टोंका संहार करूंगी।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्याः स्तुतिर्नामैकादशोऽध्यायः॥११॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतरकी कथा के अंतर्गत देवी माहाम्य नामक ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
20/3/13/10/2021

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