002. द्वितीय अध्याय (दुर्गा सप्तशती हिन्दी पाठ)
अथ श्रीदुर्गासप्तशती द्वितीय अध्याय ★ देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुर की सेना का वध।★ ॥विनियोगः॥ ॐ - मध्यम चरित्रके विष्णु ऋषि, महालक्ष्मी देवता, उष्णिक् छन्द, शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज, वायु तत्त्व और यजुर्वेद स्वरूप है। श्रीमहालक्ष्मीकी प्रसन्नता लिये मध्यम चरित्रके पाठमें इसका विनियोग है। महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका का ध्यान मन्त्र इस प्रकार है: ।। ध्यान।। मैं कमलके आसनपर बैठी हुई प्रसन्न मुखवाली महिषासुर-मर्दिनी भगवती महालक्ष्मीका भजन करता (करती) हूँ, जो अपने हाथोंमें अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड़ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करती हैं। ॐ चण्डीदेवी को नमस्कार है। मार्केंडेय ऋषि कहते हैं – पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में सौ वर्षों तक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरोंका स्वामी महिषासुर था और देवताओंके नायक इंद्र थे। उस युद्धमें देवताओं की सेना महाबली असुरों से परास्त हो गयी। सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर महिषासुर इंद्र बन बैठा। तब पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके उस स्थान पर गये...