Posts

Showing posts from October, 2024

मां कात्यायनी पूजा।

Image
🌷🌷🌷 चैत्र नवरात्रि शुक्ल षष्ठी तिथि 🌷🌷🌷                 08 अक्टूबर  मंगलवार 2024                 मां कात्यायनी पूजा। 🍁🍁🍁 कात्यायनी देवी की कथा  🍁🍁 मां कात्यायनी पूजा एवं भोग प्रसाद  🍁🍁 मां कात्यायनी ध्यान कवच स्तोत्र 🍁🍁श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति:🍁🍁🍁                   (हिन्दी भावार्थ सहित) 🍁🍁कात्यायन ऋषिकृता कात्यायनी देवी स्तुतिः 🍁🍁 🍁🍁पाण्डवाःकृता कात्यायनीस्तुतिः 🍁🍁🍁 🍁🍁🍁माँ कात्यायनी स्तोत्र 🍁🍁🍁🍁 🍁🍁 मां कात्यायनी की आरती 🍁🍁🍁🍁 🍀🌹🍀🌹🍀 कात्यायनी देवी की कथा 🌹🍀🌹🍀 नवरात्रि का छठा दिन कात्यायनी देवी को समर्पित है महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारन इनका नाम कात्यायनी पड़ा । मां दुर्गा अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी  के नाम से जानी जाती है। महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक...

क्या दुर्गा पूजा में वेश्या के घर से मिट्टी लाकर मूर्ति बनाने का विधान है ?

- क्या दुर्गा पूजा में वेश्या के घर से मिट्टी लाकर मूर्ति बनाने का विधान है ? -  दुर्गा पूजा में प्रतिमा निर्माण हेतु वेश्या के घर से मिट्टी लाने का आचार कई परम्पराएं पालन करती आ रही हैं। इसको माध्यम बनाकर परम मूढ़ता और मूर्खता से ग्रस्त कुमार्गगामी नरपिशाच गण श्रीदेवी के सन्दर्भ में अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं। सबसे पहले हम वेश्या की तन्त्रोक्त परिभाषा देखेंगे :- कुलमार्गे प्रवृत्ता या सा वेश्या मोक्षदायिनी। एवंविधा भवेद्वेश्या न वेश्या कुलटा प्रिये॥ शिव जी कहते हैं, कि व्यभिचार में रत कुलटा स्त्री को तन्त्र में वेश्या नहीं कहा गया है, अपितु कुलमार्ग में स्थित जो मोक्ष को देने वाली साधिका है, उसे वेश्या कहा गया है।  अब कुलमार्ग क्या है, यह गुरुपरम्परागम्य गूढ़ शाक्ताचार से सम्बंधित है, इसीलिए अधिक नहीं लिखूंगा, किन्तु कुलार्णव तन्त्र में वर्णित सामान्य परिभाषा बताता हूँ :- कुलं कुंडलिनी शक्तिरकुलन्तु महेश्वर:। कुलाकुलस्यतत्वज्ञ: कौल इत्यभिधीयते॥ कुण्डलिनी शक्ति को कुल और परमशिव को अकुल कहा गया है, इन दोनों का रहस्य जानने वाला ब्रह्मवेत्ता ही कौल यानी कुलमार्ग का अनुसरण करने वाल...

रोग नाशक देवी मन्त्र

रोग नाशक देवी मन्त्र  🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹 “ॐ उं उमा-देवीभ्यां नमः” इस मन्त्र से मस्तक-शूल (headache) तथा मज्जा-तन्तुओं (Nerve Fibres) की समस्त विकृतियाँ दूर होती है – ‘पागल-पन’(Insanity, Frenzy, Psychosis, Derangement, Dementia, Eccentricity)तथा ‘हिस्टीरिया’ (hysteria) पर भी इसका प्रभाव पड़ता है । “ॐ यं यम-घण्टाभ्यां नमः” इस मन्त्र से ‘नासिका’ (Nose) के विकार दूर होते हैं । “ॐ शां शांखिनीभ्यां नमः” इस मन्त्र से आँखों के विकार (Eyes disease) दूर होते हैं । सूर्योदय से पूर्व इस मन्त्र से अभिमन्त्रित रक्त-पुष्प से आँख झाड़ने से ‘फूला’ आदि विकार नष्ट होते हैं । “ॐ द्वां द्वार-वासिनीभ्यां नमः” इस मन्त्र से समस्त ‘कर्ण-विकार’ (Ear disease) दूर होते हैं । “ॐ चिं चित्र-घण्टाभ्यां नमः” इस मन्त्र से ‘कण्ठमाला’ तथा कण्ठ-गत विकार दूर होते हैं । “ॐ सं सर्व-मंगलाभ्यां नमः” इस मन्त्र से जिह्वा-विकार (tongue disorder) दूर होते हैं । तुतलाकर बोलने वालों (Lisper) या हकलाने वालों (stammering) के लिए यह मन्त्र बहुत लाभदायक है । “ॐ धं धनुर्धारिभ्यां नमः” इस मन्त्र से पीठ की रीढ़ (Spinal) के विकार (backache)...

क्यों बोए जाते हैं जौ ? जाने महत्त्व

क्यों बोए जाते हैं जौ ? जाने महत्त्व 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ नवरात्र में कलश के सामने गेहूं और जौ को मिट्टी के पात्र में बोया जाता है और इसका पूजन भी किया जाता है। हममें से न अधिकतर लोगों को पता नहीं होगा कि जौ आखिर क्यों बोते हैं? नवरात्र में जौ बोने का विशेष महत्त्व है। नवरात्र के दौरान जौ बोने की परंपरा सदियों पुरानी बताई है।  भारतीय सनातन संस्कृति में पर्व और उनको मनाए जाने का विधान शास्त्रों में व्यवस्थित किया गया है। इसमें धार्मिक परंपराओं के साथ ही वैज्ञानिक रहस्य भी छुपे हुए हैं। इन्हीं रहस्यों में यह प्रश्न सामने आता है कि नवरात्र में जौ क्यों बोए जाते हैं? तैत्तिरीय उपनिषद ने अन्न को ईश्वर कहा गया है - अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। वहां अन्न की निंदा व उसके तिरस्कार के लिए निषेध किया गया है- अन्नं न निन्द्यात् तद् व्रतम्। ऋग्वेद में बहुत से अन्नों का वर्णन है, जिसमें यव अर्थात जौ की गणना भी हुई है। मीमांसा का एक श्लोक जौ की महत्ता बताता है कि वसंत ऋतु में सभी फसलों के पत्ते झड़ने लगते हैं पर मद शक्ति से भरे हुए जौ के पौधे दानों से भरे कणिश (बालियां) के साथ खड़े रहते हैं। संस्...

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है. देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां दुर्गा का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है.  नवरात्रि के तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित हैं. इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. मां चंद्रघंटा के स्वरूप की बात की जाए तो मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्ध चंद्रमा विराजमान है इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा. इनके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला और इनका वाहन सिंह है. इस देवी के दस हाथ माने गए हैं और इनके हाथों में कमल, धनुष, बाण, खड्ग, कमंडल, तलवार, त्रिशूल और गदा आदि जैसे अस्त्र और शस्त्रों से सुसज्जित हैं. मां चंद्रघंटा के गले में सफेद फूलों की माला और शीर्ष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है. माता चंद्रघंटा युद्ध की मुद्रा में विराजमान रहती है और तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं. मान्यता है कि नवरात्रि के तीसरे दिन मां मां चंद्रघंटा की पूजा करने से व्यक्ति पराक्रमी और निर्भय हो जाता है, इसके अलावा जीवन के सभी संकट भी दूर हो जाते हैं. मां चंद्रघंटा की पूजा...

नवदुर्गा और नवग्रह उपासना विधान (विस्तृत)

नवदुर्गा और नवग्रह उपासना विधान (विस्तृत) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तांत्रिक ग्रन्थों में यह बताया गया है कि नवदुर्गा नवग्रहों के लिए ही प्रवर्तित हुईं हैं:— नौरत्नचण्डीखेटाश्च जाता निधिनाह्ढवाप्तोह्ढवगुण्ठ देव्या:|| अर्थात्👉 नौ रत्न, नौ ग्रहों की पीड़ा से मुक्ति, नौ निधि की प्राप्ति, नौ दुर्गा के अनुष्ठान से सर्वथा सम्भव है। 👉 सूर्य कृत पीड़ा की शान्ति के लिए शैलपुत्री, 👉 चन्द्रमा कृत पीड़ा की शान्ति के लिए ब्रह्मचारिणी, 👉 मंगल कृत पीड़ा की शान्ति के लिए चन्द्रघण्टा, 👉 बुध कृत पीड़ा की शान्ति के लिए कूष्माण्डा, 👉 गुरु कृत पीड़ा की शान्ति के लिए स्कन्दमाता, 👉 शुक्र कृत पीड़ा की शान्ति के लिए कात्यायनी, 👉 शनि कृत पीड़ा की शान्ति के लिए कालरात्रि, 👉 राहु कृत पीड़ा की शान्ति के लिए महागौरी, तथा 👉 केतु कृत पीड़ा की शान्ति के लिए सिद्धिदात्री... अर्थात्👉 जिस ग्रह की पीड़ा, कष्ट हो उससे संबंधित माँ दुर्गा के स्वरूप की पूजा विधि-विधान से करने पर अवश्य ही शान्ति प्राप्त होती है। नौ ग्रहों का दुष्‍प्रभाव कम करने के लिए करें दुर्गा पूजा, नवरात्रि पर मां के शक्ति स्‍वरूपों की पूजा क...

नवरात्री द्वितीय दिवस में माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप श्री ब्रह्मचारिणी जी की उपासना विधि एवं फल

नवरात्री द्वितीय दिवस माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप श्री ब्रह्मचारिणी जी की उपासना विधि एवं फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ माँ दुर्गा का द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है. देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है. माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। मां दुर्गा की नौ शक्तियो...