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Showing posts from September, 2025

ॐश्रीमहादेव्यैनमः

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ॐश्रीमहादेव्यैनमः🌷 ॐ श्रीं श्रियैनमः।ॐश्रीमहालक्ष्म्यै देव्यै नमो नमः। ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः। ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नो शुक्रः प्रचोदयात्। ॐ अन्नात् परिस्त्रुतोरसं ब्रह्मणा व्यपिकेबत्क्षत्रं पयःसोमं प्रजापतिः, ऋतेन सत्यमिन्द्रियंविपानंशुक्रमन्धसइन्द्रस्येन्द्रिय मिदं पयोऽमृतं मधु। दैत्य मन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:। प्रभु: तारा ग्रहाणांच पीड़ां हरतु मे भृगु:। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीदॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।। प्रात:स्मरामिशरदिन्दु करोज्ज्वलाभां  सद्रत्नवन् मकरकुण्डल हारभूषाम्  दिव्यायुधैर्जित सुनीलसहस्र हस्तां  रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्।।* शरद् कालीन चन्द्रमाके समान उज्ज्वल आभा वाली, उत्तम रत्नोंसेजड़ित मकरकुण्डलों तथा हारोंसे सुशोभित, दिव्यायुधोंसे दीप्त सुन्दर नीले हजारों हाथोंवाली,लालकमलकी आभा युक्त चरणों वाली परम ईशरूपिणी भगवती दुर्गादेवीका मैं प्रातःकाल स्मरण करताहूँ।  नवरात्रिमें मांदुर्गाके इन मंत्...

दुर्गासप्तशती और रात्रीसूक्त का संबंध का आध्यात्मिक विवेचना।*

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‼️*दुर्गासप्तशती और रात्रीसूक्त का संबंध का आध्यात्मिक विवेचना।*_‼️ दुर्गासप्तशती ( मार्कण्डेय पुराण का एक अंग ) और रात्रिसूक्त ( ऋग्वेद १०.१२७ और अथर्ववेद १९.४७-४८ ) दोनों ही वैदिक और पौराणिक परंपराओं में शक्ति तत्व की गहन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। दुर्गासप्तशती में शक्ति को देवी दुर्गा के रूप में और रात्रिसूक्त में रात्रि देवी के रूप में चित्रित किया गया है। दोनों के बीच गहरा संबंध है, जो शक्ति की तमोमयी, रहस्यमयी, और सर्वव्यापी प्रकृति को उजागर करता है।  दुर्गासप्तशती एक शक्तिपरक ग्रंथ है, जो देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों और उनके द्वारा सात प्रमुख असुरों ( महिषासुर, धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज, शुम्भ, निशुम्भ ) के वध का वर्णन करता है। यह ग्रंथ मानव मन की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर आत्मशक्ति की विजय का प्रतीक है। दूसरी ओर, रात्रिसूक्त रात्रि को एक दैवी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो निद्रा, अंधकार, और तमोगुण की प्रतीक है। दोनों ग्रंथों में शक्ति को एक ऐसी शक्ति के रूप में दर्शाया गया है, जो सृष्टि को नियंत्रित करती है और साधक को आत्म-जागरूकता की ओर ले जाती है। रात्रि औ...

जय माता दी

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जय माता दी🌹🙏 न तातो न माता न बन्धुर्न दाता           न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।     न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव           गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरु           प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।     कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं             गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २॥ न जानामि दानं न च ध्यानयोगं           न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।     न जानामि पूजां न च न्यासयोगं           गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ३॥ न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं           न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।     न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्-           गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४॥ कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः           कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।   ...

क्या आप जानते हैं कि माँ भगवती को... "माँ दुर्गा" क्यों कहा जाता है ?*

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क्या आप जानते हैं कि माँ भगवती को... "माँ दुर्गा" क्यों कहा जाता है ?*_ ⁉️ 🛐नवरात्र चल रहा है... जिसे हम लोग दुर्गा पूजा के नाम से भी जानते हैं... 📕पौराणिक कथा के अनुसार... *🌳 भगवती को माँ दुर्गा क्यों कहा जाता है 🌳* नवरात्र चल रहा है... जिसे हमलोग दुर्गापूजा के नाम से भी जानते हैं... लेकिन, *क्या आप जानते हैं कि माँ भगवती को... "माँ दुर्गा" क्यों कहा जाता है ???*  पौराणिक कथा के अनुसार... भगवान श्री हरि ने वराह अवतार लेकर राक्षस हिरण्याक्ष का वध किया था और पृथ्वी को अपनी जगह पुनर्स्थापित किया था... जिससे सृष्टि में आया व्यवधान दूर हुआ था। कालांतर में इसी हिरण्याक्ष के वंश में एक दैत्यराज रुरु हुआ था। और, दैत्यराज रुरु का पुत्र हुआ ... "दुर्गम" ये दुर्गम...ब्रह्मांड के तीनों लोगों पर शासन करना चाहता था। लेकिन, तीनों लोकों पर शासन हेतु देवताओं को हराना उसके लिए बड़ी चुनौती थी..! इसीलिए, दुर्गमासुर ने विचार किया कि देवताओं की शक्ति "वेद" में निहित है। (उस समय एक ही वेद थे) तो, अगर किसी तरह वेद नष्ट हो जाये या विलुप्त हो जाये तो देवतागण खुद ही नष...
"सप्तशती निर्माण की प्रक्रिया: एक शोधात्मक व्याख्या।" ✓•प्रस्तावना: देवीमाहात्म्य, जो मार्कण्डेय पुराण का एक अंश है, भारतीय सनातन परंपरा में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसे सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्रंथ देवी की महिमा, उनके विविध स्वरूपों और शक्तियों का वर्णन करता है। सप्तशती को 700 मंत्रों के रूप में जाना जाता है, हालांकि मूल रूप में मार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य में 578 मंत्र ही थे। कात्यायनी तंत्र के अंतर्गत इस ग्रंथ को 700 मंत्रों में परिवर्तित किया गया, जिसे आहुति प्रदान करने की प्रक्रिया के लिए व्यवस्थित किया गया। यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह तांत्रिक और वैदिक परंपराओं के समन्वय को भी दर्शाती है। इस शोधपत्र में सप्तशती निर्माण की प्रक्रिया का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें मंत्रों की संख्या में वृद्धि, तांत्रिक व्यवस्था, और इसके धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला जाएगा। ✓•सप्तशती का आधार और कात्यायनी तंत्र: सप्तशती का आधार मार्कण्डेय पुराण का "देवीमाहात्म्य" है, जिसमें 578 मंत्र हैं। भास्कर राय, ...

मां दुर्गा के दिव्यास्त्र की महत्ता

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मां दुर्गा के दिव्यास्त्र की महत्ता ~~~~~~~~~~~~~~~~~ जिस काम को और कोई संपन्न नहीं करता, उसे सर्वशक्ति संपन्न देवी दुर्गा कर सकती है। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी की संरचना तमाम देवी-देवताओं की संचित शक्ति के द्वारा हुई है। जिस तरह तमाम नदियों के संचित जल से समुद्र बनता है, उसी तरह भगवती दुर्गा विभिन्न देवी-देवताओं के शक्ति समर्थन से महान बनी हैं। इस आद्याशक्ति को शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष बाण, इन्द्र ने वज्र और यमराज ने गदा देकर अजेय बनाया। दूसरे देवताओं ने मां दुर्गा को उपहार स्वरूप हार चूड़ामणि, कुंडल, कंगन, नुपूर, कण्ठहार आदि तमाम आभूषण दिए। हिमालय ने विभिन्न रत्न और वाहन के रूप में सिंह भेंट किया। 1. शंख दुर्गा मां के हाथ में शंख प्रणव का या रहस्यवादी शब्द 'ओम' का प्रतीक है जो स्वयं भगवान को उनके हाथों में ध्वनि के रूप में होने का संकेत करता है। 2. धनुष-बाण धनुष बाण ऊर्जा का प्रतिनिधित्त्व करते हैं दुर्गा मां के एक ही हाथ में इन दोनों का होना इस बात का संकेत है कि मां ने ऊर्जा के सभी पहलुओं एवं गतिज क्षमता पर नियंत्...

दुर्गासप्तशती अनुष्ठान विधि

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# दुर्गासप्तशती अनुष्ठान विधि !! 🍁* शारदीय नवरात्रि में माँ की उपासना के लिये*🍁चंडी के अध्याय पाठन से संकल्प अनुसार कामनापूर्ति 1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए। 2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए। 3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये। 4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये। 5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए। 6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये। 7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये। 8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये। 9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये। 10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये। 11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये। 12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये। 13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये। दुर्गा सप्तशती का पाठ करने और सिद्ध करने की विभिन्न विधियाँ *सामान्य विधि ~~*     नवार्णमंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ, प्राच...