मां कात्यायनी पूजा।

🌷🌷🌷 चैत्र नवरात्रि शुक्ल षष्ठी तिथि 🌷🌷🌷
                08 अक्टूबर  मंगलवार 2024 
               मां कात्यायनी पूजा।

🍁🍁🍁 कात्यायनी देवी की कथा 
🍁🍁 मां कात्यायनी पूजा एवं भोग प्रसाद 
🍁🍁 मां कात्यायनी ध्यान कवच स्तोत्र
🍁🍁श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति:🍁🍁🍁
                  (हिन्दी भावार्थ सहित)
🍁🍁कात्यायन ऋषिकृता कात्यायनी देवी स्तुतिः 🍁🍁
🍁🍁पाण्डवाःकृता कात्यायनीस्तुतिः 🍁🍁🍁
🍁🍁🍁माँ कात्यायनी स्तोत्र 🍁🍁🍁🍁
🍁🍁 मां कात्यायनी की आरती 🍁🍁🍁🍁
🍀🌹🍀🌹🍀 कात्यायनी देवी की कथा 🌹🍀🌹🍀
नवरात्रि का छठा दिन कात्यायनी देवी को समर्पित है
महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारन इनका नाम कात्यायनी पड़ा ।
मां दुर्गा अपने छठे स्वरूप में कात्यायनी  के नाम से जानी जाती है। महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन उन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। इनका स्वरूप अत्यंत ही भव्य एवं दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला, और भास्वर है। इनकी चार भुजाएं हैं। माता जी का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रामें है तथा नीचे वाला वरमुद्रामें, बाई तरफ के ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है ।
रावण की कठोर तपस्या और प्रार्थना करने पर, लंका को चारो ओर से घेर कर अभेद्य किला बना दिया था माँ ने, पर रावण द्वारा माँ सीता के अपमान से नाराज होकर लंका छोड़ कर चली गयी थी माँ |

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🌷🌷माँ कात्यायनी महिमा🌷🌷
कात्यायनी देवी वृन्दावन और ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी, है।  उनकी चार भुजाओं और त्रिनेत्र  हैं, वह शेर पर निवास करती हैं। वह माँ दुर्गा के छठा स्वरूप हैं और माता कात्यायनी के नाम से जानी जाती हैं। "कैट" का पुत्र "कात्या" था। इसी "कात्य" वंश में ऋषि कात्यायन का जन्म हुआ। कात्यायन ने मां को बेटी के रूप में पाने की इच्छा से तपस्या की थी। परिणामस्वरूप उन्होंने कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए उनका नाम "कात्यायनी" है। उन्होंने राक्षस महिषासुर का वध किया। 
देवी कात्यायनी वैष्णवी शक्ति हैं भगवती लक्ष्मी की
अभिव्यक्ति स्वरूप है । महालक्ष्मी का शक्ति रूप समाहित किए हैं। इन्होंने स्वयं कात्यायनी के रूप में  भगवान कृष्ण को अपने पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की फिर गोपियाँ ने व्रज में माँ कात्र्यायनी की पूजा की श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए
 इसलिए वह व्रज की रानी के रूप में स्थापित हैं।

देवर्षि श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के बाईसवें अध्याय में उल्लेख है कि गोपियां देवी से प्रार्थना करती हैं -हे कात्यायनि! हे महामाये! हे महायोगिनि! हे अधीश्वरि! हे देवि! नन्द गोप के पुत्र को हमारा पति बनाओ हम आपका अर्चन एवं वन्दन करते हैं। 
दुर्गा सप्तशती में देवी के अवतरित होने का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-।नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा,- अर्थात मैं नन्द गोप के घर में यशोदा के गर्भ से अवतार लूंगी।
श्रीमद भागवत में भगवती कात्यायनी के पूजन द्वारा भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने के साधन का सुन्दर वर्णन प्राप्त होता है। यह व्रत पूरे मार्गशीर्ष (अगहन) के मास में होता है। भगवान श्री कृष्ण को पाने की लालसा में ब्रजांगनाओं ने अपने हृदय की लालसा पूर्ण करने हेतु यमुना नदी के किनारे से घिरे हुए राधाबाग़ नामक स्थान पर श्री कात्यायनी देवी का पूजन किया।

भगवान श्री कृष्ण की क्रीड़ा भूमि श्रीधाम वृन्दावन में भगवती देवी के केश गिरे थे, इसका प्रमाण प्राय: सभी शास्त्रों में मिलता ही है। ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं आद्या स्तोत्र आदि कई स्थानों पर उल्लेख है- व्रजे कात्यायनी परा अर्थात वृन्दावन स्थित पीठ में ब्रह्मशक्ति महामाया श्री माता कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध है। वृन्दावन स्थित श्री कात्यायनी पीठ भारतवर्ष के उन अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 शक्ति पीठ में से एक अत्यन्त प्राचीन सिद्धपीठ है।
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🌹माता कात्यायनी की पूजा और भोग प्रसाद 🌹

मां दुर्गा की छठी विभूति हैं मां कात्यायनी। शास्त्रों के मुताबिक जो भक्त दुर्गा मां की छठी विभूति कात्यायनी की आराधना करते हैं मां की कृपा उन पर सदैव बनी रहती है। कात्यायनी माता का व्रत और उनकी पूजा करने से कुंवारी कन्याओं के विवाह में आने वाली बाधा दूर होती है। 
 
मां कात्यायनी की साधना का समय गोधूली काल है। इस समय में धूप, दीप, गुग्गुल से मां की पूजा करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं। जो भक्त माता को 5 तरह की मिठाइयों का भोग लगाकर कुंवारी कन्याओं में प्रसाद बांटते हैं माता उनकी आय में आने वाली बाधा को दूर करती हैं और व्यक्ति अपनी मेहनत और योग्यता के अनुसार धन अर्जित करने में सफल होता है। 
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🌷🌷माँ कात्यायनी ध्यान 🌹🍀🌹

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

वन्दे वांछित मनोरथार्थचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

सिंहारूढचतुर्भुजाकात्यायनी यशस्वनीम्॥

स्वर्णवर्णाआज्ञाचक्रस्थितांषष्ठम्दुर्गा त्रिनेत्राम।

वराभीतंकरांषगपदधरांकात्यायनसुतांभजामि॥

पटाम्बरपरिधानांस्मेरमुखींनानालंकारभूषिताम्।

मंजीर हार केयुरकिंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम्।।

प्रसन्नवंदनापज्जवाधरांकातंकपोलातुगकुचाम्।

कमनीयांलावण्यांत्रिवलीविभूषितनिम्न नाभिम्॥
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🌹🍀माँ कात्यायनी स्तोत्र –🍀🌹🍀

कंचनाभां कराभयंपदमधरामुकुटोज्वलां।
स्मेरमुखीशिवपत्नीकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां।
सिंहास्थितांपदमहस्तांकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

परमदंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति,परमभक्ति्कात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती,विश्वभर्ती,विश्वहर्ती,विश्वप्रीता।
विश्वाचितां,विश्वातीताकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

कां बीजा, कां जपानंदकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥

कांकारहíषणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥

कां कारिणी कां मूत्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क:ठ:छ:स्वाहारूपणी॥
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 🍀🌹माँ कात्यायनी कवच – 🌹🍀🌹

कात्यायनौमुख पातुकां कां स्वाहास्वरूपणी।
ललाटेविजया पातुपातुमालिनी नित्य संदरी॥
कल्याणी हृदयंपातुजया भगमालिनी॥

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🌹कात्यायनी पूजा एवं मंत्र 🌹

. मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और तेजस्वी है जिनकी चार भुजाएं हैं. माता का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है. वहीं बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है. मां कात्यायनी की साधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है.

देवी का प्रसाद- कात्यायनी की साधना एवं भक्ति करने वालों को मां की प्रसन्नता के लिए शहद युक्त पान अर्पित करना चाहिए। या फिर शहद का अलग से भोग भी लगा सकते हैं। 
 
मां शक्ति के नवदुर्गा स्वरूपों में मां कात्यायनी देवी को छठा रूप माना गया है। मां कात्यायनी देवी के आशीर्वाद से विवाह के योग बनते हैं साथ ही वैवाहिक जीवन में भी खुशियां प्राप्त होती हैं।

 
- गोधूली वेला के समय पीले अथवा लाल वस्त्र धारण करके इनकी पूजा करनी चाहिए। 
 
- इनको पीले फूल और पीला नैवेद्य अर्पित करें। इन्हें शहद अर्पित करना विशेष शुभ होता है। 

 
-  मां को सुगंधित पुष्प अर्पित करने से शीघ्र विवाह के योग बनेंगे साथ ही प्रेम संबंधी बाधाएं भी दूर होंगी। 
 
- इसके बाद मां के समक्ष उनके मंत्रों का जाप करें। 
 
👉शीघ्र विवाह के लिए  करें मां कात्यायनी की पूजा
 
- गोधूलि वेला में पीले वस्त्र धारण करें।
 
-  मां के समक्ष दीपक जलाएं और उन्हें पीले फूल अर्पित करें। 

 
- इसके बाद 3 गांठ हल्दी की भी चढ़ाएं। 

 मां कात्यायनी के निम्न मंत्र का जाप करें। 

"कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।"

  हल्दी की गांठों को अपने पास सुरक्षित रख लें। 
 
-  मां कात्यायनी को शहद अर्पित करें।
अगर ये शहद चांदी के या मिटटी के पात्र में अर्पित किया जाए तो ज्यादा उत्तम होगा।  
 इससे आपका प्रभाव बढ़ेगा और आकर्षण क्षमता में वृद्धि होगी। 
 
जपें यह मंत्र- 
 
माता कात्यायनी का चि‍त्र या यंत्र सामने रखकर रक्तपुष्प से पूजन करें। यदि चित्र में यंत्र उपलब्ध न हो तो देवी माता दुर्गाजी का चित्र रखकर निम्न मंत्र की 51 माला नित्य जपें, मनोवांछित प्राप्ति होगी। साथ ही ऐश्वर्य प्राप्ति होगी।

 मंत्र - 'ॐ ह्रीं नम:।।'
 
चन्द्रहासोज्जवलकराशार्दुलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
 
मंत्र - ॐ ह्रीं  कात्यायन्यै नमः॥
 
अन्य मंत्र 
कात्यायनी गायत्री
 ॐ  कात्यायन्यै च विदमहे सिद्बिशक्तये च धीमहि तन्नो कात्यायनी प्रचोदयात्।

मंत्र 
1.ॐ  ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै  ॐकात्यायन्यै नमः
2.ॐ क्रीं कात्यायन्यै क्रीं नमः.
3. ॐ कात्यायन्यै नमः
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🌷🌷कात्यायनी माता  स्तुति 🌷🌷🌷

जै जै अम्बे जै कात्यायनी । जै जगमाता जग की महारानी।
बैजनाथ स्थान तुम्हारा ।वहां वरदाती नाम पुकारा।
कई नाम हैं कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है।
हर मन्दिर में जोत तुम्हारी।कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी ।
हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भक्त हैं कहते।
कात्यायनी रक्षक काया की।ग्रन्थी काटे मोह माया की ।
झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम: जपाने वाली।
ब्रहस्पतिवार को पूजा करियो । ध्यान कात्यायनी का धरियो ।
हर संकट को दूर करेगी। भण्डारे भरपूर करेगी।
जो भी मां को ‘चमन’ पुकारे । कात्यायनी सब कष्ट निवारे ।
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.🌷🌷🌷श्रीराम कृत कात्यायनी स्तुति:🌷🌷🌷
                  (हिन्दी भावार्थ सहित)

॥ श्रीराम उवाच ॥

नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि
प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

श्रीरामजी बोले-त्रिलोकवन्दनीया! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनि आपको बार-बार नमस्कार है। आप मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें।

सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि
दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥

सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें आपको नमस्कार है।

त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता ।
दुष्टं संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥

आप ही सभी प्राणियों में निवास करनेवाली परा शक्ति हैं। संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझ विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

रणप्रिये रक्तभक्षे मांसभक्षणकारिणि ।
प्रपन्नार्तिहरे युद्धे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥

युद्धप्रिये! 'शरणागत की पीड़ा हरनेवाली तथा [ राक्षसों का"]
रक्त एवं मांस भक्षण करनेवाली जगदम्बे ! युद्ध में मुझे विजय
प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

खट्वाङ्गासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे ।
ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु तेषां दुःखहरा भव ॥ ५ ॥

हाथ में खट्वांग तथा खड्ग धारण करनेवाली एवं मुण्डमाला से सुशोभित विग्रहवाली भगवती! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुःख हरण कीजिये ।

त्वत्पादपङ्कजादैन्यं नमस्ते शरणप्रिये
विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ६॥

शरणागतप्रिये! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिये, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार हैं, पुनः नमस्कार हैं।

अचिन्त्यविक्रमेऽचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि
अचिन्त्यचरितेऽचिन्त्ये जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥

आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिमित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिन्तन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिन्त्य हैं। मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवी दुर्गविनाशिनीम्
नावसीदन्ति दुर्गेषु जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करनेवाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

महिषासप्रिये संख्ये महिषासुरमर्दिनि
शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥

युद्ध में महिषासुर का मर्दन करनेवाली तथा उस महिषासुर के रक्तपान में अभिरुचि रखनेवाली, शरण ग्रहण करने योग्य हिमालयसुता! आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

प्रसन्नवदने चण्डिचण्डासुरविमर्दिनि
संग्रामे विजयं देहि शत्रुञ्जहि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥

चण्डासुर का नाश करनेवाली प्रसन्नमुखी चण्डिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

रक्ताक्षि रक्तदशने रक्तचर्चितगात्रके ।
रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥

रक्तवर्ण के नेत्रवाली, रक्तरञ्जित दन्तपक्तिवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती! आप रक्तबीज का संहार करनेवाली हैं। आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि विश्वकत्रि सुरेश्वरि
जहिशत्रून् रणे नित्यं जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥

निशुंभ तथा शुंभ का संहार करनेवाली तथा जगत की सृष्टि
करनेवाली सुरेश्वरि! आज नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार
कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार
है ‌

भवान्येतज्जगत्सर्वं त्वं पालयसि सर्वदा
रक्ष विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान् ॥ १३ ॥

भवानी! आप सर्वदा इस सम्पूर्ण जगत का पालन करती हैं। मातः ! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिये।

त्वं हि सर्वगता शक्तिर्दुष्टमर्दनकारिणि
प्रसीद जगतां मातर्जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥

दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती ! आप सबमें विद्यमान रहनेवाली शक्तिस्वरूपा है। जगतमाता! प्रसन्न होइए, मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है ।

दुर्वृत्तवृन्ददमनि सद्वृत्तपरिपालिनि
निपातय रणे शत्रुञ्जयं देहि नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥

दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक पालन करनेवाली भगवती युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

कात्यायनि जगन्मातः प्रपन्नार्तिहरे शिवे ।
संग्रामे विजयं देहि भयेभ्यः पाहि सर्वदा ॥ १६ ॥

शरणागतों का दुःख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिये और भय से सदा रक्षा कीजिये ।

॥ इति श्रीमहाभागवते देवीपुराणे श्रीमहादेवनारद संवादे श्रीरामकृता कात्यायनीस्तुतिः ॥
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🌷 🌷🌷कात्यायन ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः 🌷🌷🌷

॥ कात्यायनी स्वरूप रहस्य॥

कात्यायनी दशभुजा देवी ही महिषासुर मर्दिनी है । प्रथम कल्प
में उग्रचण्डा रूप में, द्वितीय कल्प में १६ भुजा भद्रकाली रूप में
तथा तृतीय कल्प में कात्यायनी ने दश भुजा रूप धारण करके
महिषासुर का वध किया । कात्यायनी मुनि के द्वारा स्तुति करने पर
बिल्व वृक्ष के पास देवी प्रकट हुई थी । आश्विन कृष्णा १४ को
भगवती प्रकट हुई थी । शुक्ला सप्तमी को देवी की तेजोमयी मूर्ति
ने शोभनरूप धारण किया । अष्टमी को समलङ्कृत की गई तथा
नवमी को उपहारों से पूजित हुई एवं उसने महिषासुर का वध किया
तथा दशमी को देवी विदा हुई (इति कालिका पुराणे) ।

नमस्कार ध्यान ।
चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवि दानव घातिनी ॥

कात्यायनी गायत्री -
ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी धीमहि तन्नो दुर्गेः प्रचोदयात् ।

कात्यायनी ध्यानम् ।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी ॥

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद, प्रसीद। मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥

🍁॥ कात्यायनीस्तुतिः ऋषिकृता ॥🍁
       (महाकाल संहितायाम्)

जगदम्ब जयानन्ते सर्वेकसाक्षिणि ।
सङ्कटोद्धारिणि शिवे भक्तानामभयङ्करे ॥

समस्त जगताधारभूते ब्रह्मस्वरूपिणि ।
विधीश हरि शक्रादि देवा विदित वैभवे ॥

सृष्टि स्थिति प्रलयकृत् त्रिगुणात्मक विग्रहे ।
परापरेशि प्रणतमनुज-प्राणदायिनि ॥

मदुपास्यतया ख्यातनाम्नि त्रिभुवनेश्वरि ।
कात्यायनि जगद्वन्द्ये महाकालि नमोस्तुते ॥

मत्प्राणरक्षणकृते भीनाशय दिवौकसाम् ।
स्वरूपं दर्शयामुष्मै विल्ववृक्षाद् विनिःसृता ॥

दशभुजा कात्यायनी ध्यानम् ।
जटाजूटसमायुक्तामर्धेन्दुकृत लक्षणाम् ।
नेत्रत्रयसमायुक्तां पद्मेन्दुसदृशाननाम् ॥

अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम् ।
नवयौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् ॥

सुचारुदशनां तद्वत्पीनोन्नतपयोधराम् ।
त्रिभङ्गस्थान संस्थानां महिषासुरमर्दिनीम् ॥

त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः ।
तीक्ष्णं बाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत ॥

खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुश मूर्ध्वतः ।
घण्टां वा परशुं चापि वामतः सन्निवेशयेत् ॥

अधस्तान्महिषं तद्वधि शिरस्कं प्रदर्शयेत् ।
शिरश्चेदोद्भवं तद्वद्दानवं खड्गपाणिनम् ॥

🍁॥ षोडशभुजा दुर्गा ध्यानम् ॥🍁

महिषासुर मर्दिनी षोडशभुजा दुर्गा भद्रकाली ही है ।

क्षीरोदस्योत्तरे तीरे विभ्रती विपुलां तनुम् ।
अतसीपुष्पवर्णाभा ज्वलत्काञ्चनकुण्डलाम् ॥

जटाजूटमखण्डेन्दुमुकुटत्रय भूषिता ।
नागहारेण सहिता स्वर्णहार विभूषिता ॥

शूलं खड्गं च शङ्ख च चक्रं बाणं तथैव च ।
शक्तिं वज्रं च दण्डं च नित्यं दक्षिणबाहुभिः ॥

विभ्रती सततं देवी विकाशिनयनोज्ज्वला ।
खेटकं चर्म चापं च पाशञ्चाङ्कुशमेव च ॥

घण्टां परशुं मुशलं विभ्रतो वामपाणिभिः ।
सिंहस्था नयनै रक्तवर्णैस्त्रिभिरभिज्ज्वला ॥

शूलेन महिषं भित्त्वा तिष्ठती परमेश्वरी ।
वामपादेन चाक्रम्य तत्र देवी जगन्मयी ॥

🍁🍁अष्टादशभुजा दुर्गा ध्यानम् ।🍁🍁

अष्टादशभुजा दुर्गा उग्रचण्ड स्वरूपा है ।
कल्पभेद महिषासुरमर्दिनि का महालक्ष्मी स्वरूपा भेद भी यही है ।

ध्यानम् ।
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुःकुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ॥। १॥

शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मी सरोजस्थिताम् ॥ २॥

अन्यच्च ।
ततो ध्यायेन्महालक्ष्मी महिषासुरमर्दिनीम् ।
समस्तदेवता तेजोजातां पद्मासन स्थिताम् ॥

अष्टादशभुजामक्षमालां पद्मं च शायकान् ।
खड्गं वज्रं गदां चक्रं दक्षहस्ते कमण्डलुम् ॥

खड्गं च दधतीं वामे शक्तिं च परशुं धनुः ।
चर्मदण्डौ सुरापात्रं घण्टां पाशं त्रिशूलकम् ॥

अष्टादशभुजा ध्यानम् ।
धम्मिल्लसंयतकचा विधोश्चाधोमुखीं कलाम् ।
केशान्ते तिलकस्योद्धे दधती सुमनोहरा ॥

मणिकुण्डल सन्धृष्टगण्डा मुकुटमण्डिता ।
सज्ज्योतिः कर्णपूराभ्यां कर्णावापूर्य सङ्गता ॥

ससुवर्णमणिमाणिक्य नागहार विराजिता ।
सदासुधिभिः पद्मैरम्लानैरति सुन्दरी ॥

मालां विभर्ति ग्रीवायां रत्नकेयूरधारिणी ।
मृणालायत वृत्तैस्तु बाहुभिः कोमलै शुभैः ॥

राजन्ती कञ्जुकोपेता पीनोन्नत पयोधरा ।
क्षीणमध्या पीतवस्त्रा त्रिवलोमध्यभूषिता ॥

अष्टादशभुजैका तु दक्षे मुण्डं च खेटकम् ।
आदर्शं तर्जनीं चाप ध्वजं डमरुकं चर्मं च ॥

पाशं वामे विभ्रती च शक्ति मुद्गर शूलकम् ।
वज्र खड्गाङ्कुश शरांश्चक्रं देवी शलाकया ॥

सिंहोस्योपरि तिष्ठन्ती व्याघ्रचर्मणि कौशिकी ।
विभ्रती रूपममतुलं ससुरासुर मोहनम् ॥

(अस्त्रों का क्रम पुरश्चर्यार्णव में अधूरा है अतः अस्त्रक्रम
अग्निपुराण में से दिया है ।)

वैकृति रहस्य में अस्त्रों का क्रम इस प्रकार से है ।

अक्षमाला च कमलं वाणोऽसि कुलिशं गदा ।
चक्रं त्रिशूलं परशुः शङ्खो घण्टा च पाशकः ॥

शक्तिर्दण्डश्चर्म चापं पानपात्रं कमण्डलुः ।
अलङ्कृतभुजामेभिरायुधैः कमलासनम् ॥

इसी तरह मध्यम चरित में १८ भुजा का ध्यान अलग है ।

इति कात्यायन ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः समाप्ता ।
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🌷🌷🌷पाण्डवाःकृता कात्यायनीस्तुतिः 🌷🌷🌷

पाण्डवा ऊचुः ।
कात्यायनि त्रिदशवन्दितपादपद्मे
      विश्वोद्भवस्थितिलयैकनिदानरूपे ।
देवि प्रचण्डदलिनि त्रिपुरारिपत्नि
      दुर्गे प्रसीद जगतां परमार्तिहन्त्रि ॥ १॥

त्वं दुष्टदैत्यविनिपातकरी सदैव
      दुष्टप्रमोहनकरी किल दुःखहन्त्री ।
त्वां यो भजेदिह जगन्मयि तं कदापि
      नो बाधते भवसु दुःखमचिन्त्यरूपे ॥ २॥

त्वामेव विश्वजननीं प्रणिपत्य विश्वं
      ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरहोत्ति शम्भुः ।
काले च तान्सृजसि पासि विहंसि मात
      स्त्वल्लीलयैव नहि तेऽस्ति जनैर्विनाशः ॥ ३॥

त्वं यैः स्मृता समरमूर्धनि दुःखहन्त्रि
      तेषां तनून्नहि विशन्ति विपक्षबाणाः ।
तेषां शरास्तु परगात्रनिमग्नपुङ्खाः
      प्राणान्ग्रसन्ति दनुजेन्द्रनिपातकत्रि ॥ ४॥

यस्त्वन्मनुं जपति घोररणे सुदुर्गे
      पश्यन्ति कालसदृशं किल तं विपक्षाः ।
त्वं यस्य वै जयकरी खलु तस्य वक्त्राद्
      ब्रह्माक्षरात्मकमनुस्तव निःसरेच्च ॥ ५॥

त्वामाश्रयन्ति परमेश्वरि ये भयेषु
      तेषां भयं नहि भवेदिह वा परत्र ।
तेभ्यो भयादिह सुदूरत एव दुष्टा-
      स्त्रस्ताः पलायनपराश्च दिशो द्रवन्ति ॥ ६॥

पूर्वे सुरासुररणे सुरनायकस्त्वां
      सम्प्रार्थयन्नसुरवृन्दमुपाजघान ।
रामोऽपि राक्षसकुलं निजघान तद्व-
      त्त्वत्सेवनादृत इहास्ति जयो न चैव ॥ ७॥

तत्त्वां भजामि जयदां जगदेकवन्द्यां
      विश्वाश्रयां हरिविरञ्चिसुसेव्यपादाम् ।
त्वं नो विधेहि विजयं त्वदनुग्रहेण
      शत्रून्निपात्य समरे विजयं लभामः ॥ ८॥
इति पाण्डवाःकृता कात्यायनीस्तुतिः समाप्ता ।
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🌷🌷🌷माँ कात्यायनी स्तोत्र ||🌷🌷🌷

॥ ध्यान मंत्र ॥

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्। 
सिंहारूढ चतुर्भुजाकात्यायनी यशस्वनीम् ॥

अर्थ - मैं मनोवांछित लाभ प्राप्त करने के लिए, सभी तरह के मनोरथों को पूरा करने वाली, मस्तक पर अर्ध चंद्र को धारण करने वाली, सिंह की सवारी करने वाली, चार भुजाओं वाली और यश प्रदान करने वाली माँ कात्यायनी, की वंदना करता हूँ।

स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्रस्थितां षष्ठम्दुर्गा त्रिनेत्राम।
 वराभीतंकरां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि ॥

अर्थ - कात्यायनी माता के शरीर का रंग स्वर्ण धातु जैसा चमकदार है। वे हमारे आज्ञा चक्र में स्थित होती हैं और उसे मजबूत करने का कार्य करती हैं। वे माँ दुर्गा का छठा रूप हैं जिनके तीन नेत्र हैं। उनके हाथ भक्तों को वरदान व अभय देने की मुद्रा में हैं। यह धरती उनके पैरों में है। हम सभी भक्तगण कात्यायनी माँ का ही ध्यान करते हैं।

पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखीं नानालंकार भूषिताम्। 
मंजीर हार केयूर किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम् ॥

अर्थ- कात्यायनी मां पीले रंग के वस्त्र धारण करती है। उनके मुख पर नेह के भाव हैं और उन्होंने नाना प्रकार के आभूषणों से अपना अलंकर किया हुआ है। उन्होंने अपने शरीर पर मंजीर, हार, केयूर, किंकिणी व रत्नों से जड़ित कुंडल धारण किये हुए हैं।

प्रसन्नवद‌ना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम् ॥

अर्थ- मैं प्रसन्न मन के साथ कात्यायनी माँ की आराधना करता हूँ। उनका स्वरुप बहुत ही सुंदर, कमनीय, रमणीय व वैभव युक्त है। तीनों लोकों में उनकी पूजा की जाती है।

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प्रसन्नवद्ना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम् ॥

अर्थ- मैं प्रसन्न मन के साथ कात्यायनी माँ की आराधना करता हूँ। उनका स्वरुप बहुत ही सुंदर, कमनीय, रमणीय व वैभव युक्त है। तीनों लोकों में उनकी पूजा की जाती है।

॥ स्तोत्र ॥

कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
 स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते ॥

अर्थ - कात्यायनी देवी की आभा से हम सभी को अभय मिलता है और हमारे भय दूर हो जाते हैं। उन्होंने अपने हाथ में कमल पुष्प ले रखा है और मस्तक पर मुकुट पहन रखा है जिसमें से प्रकाश निकल रहा है। उनका मुख आनंद देने वाला है और वे भगवान शिव की पत्नी हैं। मैं कात्यायनी माता का पुत्र, उन्हें नमस्कार करता हूँ।

पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्। 
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥

अर्थ- मां कात्यायनी ने पीले रंग के परिधान पहन रखे हैं और तरह-तरह के आभूषणों से अपना श्रृंगार किया हुआ है। वे सिंह की सवारी करती हैं और उनके हाथों में कमल का फूल है। मैं कात्यायनीमाता का सेवक, उन्हें प्रणाम करता हूँ।

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। 
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते ॥

अर्थ - देवी कात्यायनी हमें आनंद प्रदान करती हैं और वे ही परम सत्य व परम ब्रह्म का रूप हैं। कात्यायनी देवी ही सर्वशक्तिशाली व परमभक्ति का रूप हैं। मैं कात्यायनी माँ का भक्त उन्हें नमन करता हूँ।

विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। 
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते ॥

अर्थ- माता कात्यायनी इस विश्व को चलाती हैं, हमें जीवन देती हैं, हमारा जीवन लेती भी हैं और इस विश्व में प्रेम का संचार करती हैं। वे ही इस विश्व के प्राणियों की हर चिंता हर लेती हैं और वे ही हमारा भूतकाल हैं। मैं कात्यायनी का सेवक, उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूँ।

कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते ।
 कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता ॥

अर्थ - कात्यायनी माता इस सृष्टि का बीज मंत्र हैं और वे ही इस सृष्टि की आधार देवी हैं। जो भी कात्यायनी माता के बीज मंत्र का जाप करता है, उसे परम आनंद की प्राप्ति होती है। कात्यायनी माता ही हमारा भरण-पोषण करती हैं। हम सभी कात्यायनी देवी की ही संतान हैं।

कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
 कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा ॥

अर्थ - कात्यायनी माँ के ध्यान से हमें हर्ष की अनुभूति होती है। वे ही हमें धन व सुख प्रदान करती हैं। जो भी सच्चे मन के साथ कात्यायनी देवी के बीज मंत्र का जाप करता है, उसकी तपस्या सफल हो जाती है और वह मोक्ष को प्राप्त करता है।

कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी। 
कां कीं कूकै कः ठः छः स्वाहारूपिणी ॥

कां कारिणी कां मंत्र पूजिता कां बीज धारिणी 
कां कीं कूं कैं क: ठ: छ: स्वाहा रूपिणी को नमस्कार है।
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🌷🌷🌷 मां कात्यायनी आरती 🌷🌷🌷

जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।
जय जग माता, जग की महारानी।
बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहां वरदाती नाम पुकारा।
कई नाम हैं, कई धाम हैं।
यह स्थान भी तो सुखधाम है।
हर मंदिर में जोत तुम्हारी।
कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी।
हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भक्त हैं कहते।
कात्यायनी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की।
झूठे मोह से छुड़ाने वाली।
अपना नाम जपाने वाली।
बृहस्पतिवार को पूजा करियो।
ध्यान कात्यायनी का धरियो।
हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी।
जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे।
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