पवित्र चैत्र नवरात्रि के शुभारंभ

नौ माताओं के इस महापर्व के साथ हिंदू नव वर्ष की शुभकामनाएं ' पवित्र चैत्र नवरात्रि के शुभारंभ के साथ हिंदू नव वर्ष की आप सभी को शुभकामनाएं अनंत बधाइयां'

वासंतिक नवरात्र

नवरात्रि का पहला दिन यानी प्रतिपदा तिथि मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री को समर्पित माना जाता है। इस दिन जौं (जवार) बोने तथा कलश स्थापना पूजन के साथ ही देवी का पूजन किया जाना शुभ माना जाता है। 

यह भी शास्त्रों में लिखा गया है कि प्रथम दिवस में माता की पूजा करते समय आराधक यदि लाल, गुलाबी नारंगी और रानी रंग के कपड़े पहन कर पूजा करने से माता का संपूर्ण आशोवाद प्राप्त होता है। 

द्वितीय दिवस यानी नवरात्रि के दूसरे दिन अत्यंत दिव्य देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना का विधान है सिद्धि के लिए इस दिन मां की उपासना करते समय सफेद, पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है एवं इस पवित्र दिन में आराधना करने से मनवांछित इच्छाओं की प्राप्ति होती है। 

तृतीय दिवस में बाघ पर सवार स्वर्ण के समान रंग एवं छटा वाली मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन पीला, लाल, दुधिया या केसरिया रंग कपड़े पहनना शुभ माने जाते हैं एवं इन रंगों के कपड़े पहनकर देवी की आराधना करने से उनका आशीर्वाद एवं कृपा की प्राप्ति होती है। 

नवरात्रि में चतुर्थ दिवस में इस भव संसार के ब्रह्मांड की रचना करने वाली दुर्गा मां के चौथे रूप के रूप में देवी कुष्मांडा की आराधना एवं भक्ति की करना शुभ फल देने वाला है ।

एवं देवी प्रकृति की देवी हैं इनकी उपासना इस दिवस में पीला, हरा, लाल और भूरे रंग का वस्त्र भगवान कार्तिकेय की माता देवी स्कंदमाता की आराधना एवं श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है। 

नवरात्रि के इस पावन पर्व पर छठवें दिन ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायनी मां की पूजा अर्चना का शास्त्रों में पूजा का विधान माना जाता है। माता कात्यायनी अमोघ फलदाईनी होती हैं 1 दिन लाल गुलाबी गेरुआ रंग के कपड़े पहन कर पूजा करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और साथ ही वैवाहिक जीवन में शांति सुख समृद्धि प्राप्त होती है। 

दुर्गा पूजा के अपने पूर्व जन्म सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा तथा अर्चना का विधान है, नवरात्रि की पूजा में तंत्र साधना करने वाले लोग इस दिन काले रंग का वस्त्र चारण करके इनकी पूजा अर्चना करते हैं साधकों को इस दिन बैगनी, स्लेटी नीला एवं आसमानी रंग का वस्त्र धारण कर मा के इस दिव्य इसी रूप की पूजा अर्चना करनी चाहिए जिससे संपूर्ण ग्रह बाधाएं दूर होती हैं।

नवरात्रि के पंचम दिन अर्थात पंचमी को भगवान कार्तिकेय की माता देवी स्कंदमाता की आराधना एवं श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है। 

नवरात्रि के इस पावन पर्व पर छठवें दिन ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायनी मां की पूजा अर्चना का शास्त्रों में पूजा का विधान माना जाता है। माता कात्यायनी अमोघ फलदाईनी के वैवाहिक जीवन में शांति सुख समृद्धि प्राप्त होती है। 

दुर्गा पूजा के अपने पूर्व जन्म सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा तथा अर्चना का विधान है, नवरात्रि की पूजा में तंत्र साधना करने वाले लोग इस दिन काले रंग का वस्त्र चारण करके इनकी पूजा अर्चना करते हैं साधकों को इस दिन बैगनी, घर पुत्री में उत्पन्न उपदेश से इन्होंने रूप में प्राप्त करने तपस्या की थी। 

नवरात्रि के आठवें दिन सर्व सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी महागौरी की उपासना का दिन माना जाता है। यह अत्यंत पवित्र दिन होता है और यह देवी धन, वैभव, सुख शांति की शक्तिशाली देवी मानी जाती हैं। इनकी पूजा के दौरान साधकों को रातों को केसरिया संतरी गुलाबी या लाल रंग के वस्त्र धारण करके पूजा करनी चाहिए जिससे सुख एवं सौभाग्य की अखंड प्राप्ति होती है। 

नवरात्रि के नव दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है जिसमें नौवें दिन सभी आठों अर्थात नौ देवियों की पूरे रीति-रिवाज के साथ पूजा की जाती है। नवरात्रि में माताओं की आराधना करने वाले साधकों को संपूर्ण सिद्धियां प्राप्त होती हैं और इनकी उपासना के समय हरा धागों को लाल गुलाबी नारंगी रंग के वस्त्र पहनने से समाज में पद प्रतिष्ठा वैभव एवं धन की प्राप्ति होती है। 
 
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों का पूजन अर्चना एवं निष्ठा से की गई आराधना से इस जगत का कल्याण भी होता है साथ ही इस पवित्र 9 दिनों में असख्य दीप जलाकर माता को प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है। नवरात्रि में उपवास रखने तथा विधि विधान से अर्चना करने से मनुष्य का जीवन तथा परलोक सफल होना शास्त्रों के अनुसार तय माना जाता है।


मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा पूरे देश में दस दिन तक धूमधाम से की जाती है। यह नवरात्र का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है। प्रथम चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिसे वासन्तिक नवरात्र का पवित्र नाम दिया गया है, जिसका वर्णन पूर्वक लेख मेरे 2 अप्रैल 2022 के आर्टिकल में विस्तार पूर्वक लिखा गया है अब द्वितीय आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में, जिसे शारदीय नवरात्र कहा जाता है, का वर्णन इस प्रकार है, इस पर्व पर मां दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित करने के साथ यह पवित्र पर्व पर अधिकांश जनमानस उपवास या व्रत शुरू कर माता का पवित्र स्मरण कर वैश्विक जन् की मंगल कामनाओं के साथ शुरू करते हैं। इस शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का संबंध धार्मिक ग्रंथों में पौराणिक कथा का उल्लेख है। इस कथा के अनुसार एक समय देवताओं के राजा इंद्र एवं राक्षसों के राजा महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया था युद्ध में देवराज इंद्र की पराजय हुई थी, तब म दुर्गा ने 9 दिन तक लगातार महिषासुर के साथ युद्ध कर दसवे दिन उसे पराजित कर उसका वध किया था। दुर्गा मां का तबसे महिषासुरमर्दिनी भी सम्मान पूर्वक नाम दिया गया था। वह त्यौहार पूरे देश में पूरी श्रद्धा और लगन से तो बनाए ही जाता है पर विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में बड़े ही हर्ष उल्लास उत्साह एवं निष्ध के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। बंगाल में पछी के दिन प्राण प्रतिष्ठा के इस विधि विधान की बोधन अर्थात शुभारंभ कहा जाता है। इसी दिन माता के मुख से आवरण हटाया जाता है। पूरे हिंदुस्तान के लोग इस नवरात्रि में व्रत उपवास रहकर मां दुर्गा की उपासना में रत रहते हैं। गुजरात में में शारदीय नवरात्र के दौरान डॉडिया तथा गरबा की धूम रहती है। नवयुवक तथा नवयुवतियां अपने साथियों के साथ गरबा खेलते हैं। इस दौरान वह रखा जाता है, देवी की 9 दिनों अखंड ज्योत जलाई जाती है और प्रतिदिन हवन कुंड में यज्ञ किया जाता है। इस तरह शारदीय नवरात्रि का त्यौहार बड़े ही पवित्र तरीके से एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है मा दुर्गा सबकी मनोकामना भी पूर्ण करती हैं ऐसी आस्था एवं विश्वास आमजन के दिलों में समाया हुआ है। दुर्गा पूजा पूरे 9 दिन तक अनवरत चलती है 9 दिन के पश्चात दशमी के दिन शाम को उनकी प्रतिमा का विसर्जन भी किया जाता है और इस दशमी को विजयादशमी के त्यौहार के रूप में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। विजया या दशहरा बनाने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। भगवान राम ने रावण पर विजय पाने के लिए मां दुर्गा की पूजा और व्रत किया था इसीलिए इस दिन को शक्ति पूजा के रूप में मनाते हैं। एवं अस्त्र शस्त्र की पूजा भी की जाती है। अंततः भगवान राम ने मां दुर्गा के अखंड आशीर्वाद से रावण का वध कर विजय पाई थी और तब से दसवीं यानी दुर्गा पूजा के दसवें दिन दशहरा के रूप में मनाने के पीछे श्री रामचंद्र जी की दुर्गा के प्रति अखंड आस्था विश्वास एवं श्रद्धा का प्रतीक मानकर दशहरे के दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले हिमाचल प्रदेश में कुल्ल शहर दशहरे का मेला बहुत ज्यादा प्रसिद्ध दशहरे के दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू शहर दशहरे का मेला बहुत ज्यादा प्रसिद्ध एवं विख्यात है। यह मेला कई दिनों तक मनाया जाता है। मां दुर्गा का शारदीय नवरात्रि एवं विजयादशमी का त्यौहार अनीति, अत्याचार, तामसिक प्रवृत्तियों का नाश एवं बुराई के अंत का बहुत ही पवित्र प्रतीक है। नवरात्रि तथा विजयादशमी का त्यौहार मां दुर्गा सिंह वाहिनी की असीम शक्ति, अनंत पराक्रम की पवित्रता एवं रामचंद्र जी की भक्ति, शक्ति एवं आदर्शों का आभास कराने वाला बहुत ही पवित्र त्यौहार है। नवरात्रि में दुर्गा के अलग-अलग रूपों की प्रतिदिन पूरी श्रद्धा के साथ पूजा एवं ज्योत जलाकर हवन किया जाता है। मां दुर्गा के नौ रूरूप प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चंद्रघंटा, चतुर्थ कुष्मांडा, पंचम कात्यायनी, पक्षम कालरात्रि, अष्टम महागौरी, नवम सिद्धिदात्री माने जाते हैं हर दिन इन सब की अलग अलग अनंत श्रद्धा, भक्ति तथा विश्वास के साथ पूजा की जाती है। आप सभी को पवित्र नवरात्रि पर्व की अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं।




*नवरात्री के नौ दिन माँ के अलग-अलग भोग।*
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1🌹 प्रथम नवरात्रि पर मां को गाय का शुद्ध घी या फिर सफेद मिठाई अर्पित की जाती है।

2🌹 दूसरे नवरात्रि के दिन मां को शक्कर का भोग लगाएं और भोग लगाने के बाद इसे घर में सभी सदस्यों को दें। इससे उम्र में वृद्धि होती है।

3🌹 तृतीय नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई, खीर का भोग मां को लगाएं एवं इसे ब्राह्मण को दान करें। इससे दुखों से मुक्ति होकर परम आनंद की प्राप्ति होती है। 

4🌹 चतुर्थ नवरात्र पर मां भगवती को मालपुए का भोग लगाएं और ब्राह्मण को दान दें। इससे बुद्धि का विकास होने के साथ निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है। 

5🌹नवरात्रि के पांचवें दिन मां को केले का नैवेद्य अर्पित करने से शरीर स्वस्थ रहता है। 

6🌹नवरात्रि के छठे दिन मां को शहद का भोग लगाएं, इससे आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है। 

7🌹सप्तमी पर मां को गुड़ का नैवेद्य अर्पित करने और इसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं अचानक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।

8 🌹अष्टमी व नवमी पर मां को नारियल का भोग लगाएं और नारियल का दान करें। इससे संतान संबंधी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
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जीवात्मा को परमात्मा से मिलवाने का माध्यम है उपवास

जबलपुर, यशभारत राष्टपिता महात्मा गांधी हफ्ते में एक दिन का उपवास रखा करते थे और दूसरे दिन बकरी के दूध से जमाया हुआ दही का सेवन करते थे, जिस कारण उनके शरीर में इतनी ऊर्जा का समावेश था की, कड़कड़ाती ठंड में भी वे मात्र एक धोती पहनकर कोसों पैदल चला करते थे को जहां स्थिर करता है, वही तन को का संचार करता है यश भारत के लोकप्रिय कार्यक्रम जीवन ज्योतिष में नवरात्र विशेष कार्यक्रम के चलते आज हम व्रत से जुड़ी बातों को लेकर पंडित लोकेश ! व्यास से चर्चा कर रहे हैं। जीवन ज्योतिष

उपवास और धर्म में क्या संबंध

पंडित लोकेश व्यास के अनुसार जो आत्मा से परमात्मा के मिलन का एकमात्र माध्यम उपवास है, मन चित्त और तन को स्थिरता प्रदान करने के लिए उपवास किया जाता है। पॉडत श्री व्यास कहते हैं कि निरंतर रूप से अनाज जब शरीर में जाता है तो शरीर भारी होने लगता है ठीक उसी तरह जैसे रुई को पानी में भिगोने से रूई भारी हो जाती है, जिससे कोलेस्ट्रॉल, गैस और अपच जैसी समस्याएं सामने आती हैं।


पाचन तंत्र होता है हल्का

पंडित लोकेश व्यास ने उपवास के विषय में बताते हैं कि जब शरीर में अन्न नहीं जाता है या फिर बहुत कम मात्रा में जाता है तो उपवास हमारे मन वीडियो देखने के लिए यश पाचन तंत्र अत्यंत हल्का हो जाता है। जिस कारण एचडीआई यानी गुड कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ता है और एलडीआई तेजी से घटना शुरू हो जाता है।

शुगर व अन्य बीमारियों के मरीज रखें सावधानी

पॉडत लोकेश व्यास कहते हैं कि पूर्व में निर्जला उपवास रखा जाता था फिर एक लोंग से उपवास किया जाने लगा लेकिन अब लोगों की शारीरिक स्थितियां बदल चुकी हैं डायबिटीज जैसी बीमारियों के मरीज अधिकता में मिल जाते हैं, ऐसी बीमारियों से ग्रसित मरीजों को उपवास रखते समय अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए।

उपवास के दौरान रखे सावधानियां

पंडित लोकेश व्यास कहते हैं कि उपवास के दौरान कुछ विशेष सावधानियां रखनी चाहिए जिसमें हर 45 मिनट में हमें पानी जरूर पीना चाहिए जो शरीर को डिटॉक्स कर देता है। इसके साथ ही आप फलों का सेवन करें अगर फल उपलब्ध ना हो तो सब्जियों भी खा सकते हैं जिसमें कच्चा पपीता, लौकी को उबालकर या आलू खा सकते हैं, इसके साथ ही पनीर और दूध दही, सिंघाड़े, कद्दू का आटा का सेवन करें।

चिकनाई युक्त पदार्थ के सेवन से बचें

पंडित लोकेश व्यास बताते हैं कि उपवास के दौरान चिकनाई युक्त खानपान से बचना चाहिए जिसके कारण आपका मन और धमनिया शिथिल पड़ती हैं, इस कारण आपकी चैतन्यता और एनर्जी में कमी आती है। आप खानपान में जायफल का पाउडर, जीरा और काली मिर्च का उपयोग करें। इससे जायका भी बढ़ जाता है।

10 महाविद्याओं का वर्णन

पंडित लोकेश व्यास कहते हैं कि 10 महाविद्याओं का वर्णन किया गया है जिसमें काली तारा, शौडषी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी मां बगलामुखी, धूमावती, कमला, मातंगी का वर्णन मिलता है जिसमें माता काली प्रथम महाविद्या मानी गई है जिनका चार प्रकार से पूजन होता है, दक्षिणा काली, श्मशान काली, मात काली और महाकाली का पूजन किया जाता है।



त्रिगुण एवं ऊर्जा संतुलन का पर्व है नवरात्र

ज्ञान एवं शक्ति अर्थात पुरुष एवं प्रकृति का संगम ही जीवन है, चाहे वह जीव के सृजन की बात हो या जीवन के एस. वी. सिंह 'प्रहरी' संचालन का विषय हो, सभी इन्हीं दोनों की मायावी क्रियाओं के कारण ही प्रत्यक्ष होता है। वास्तव में हमारे प्राचीन वेद-पुराणों में 'इसे ही 'शिव' एवं 'शक्ति' कहा गया है। शिव का तात्पर्य सूक्ष्म चेतना से है तथा शक्ति का तात्पर्य प्रकृति की पंचमहाभूत ऊर्जा शक्ति' से है और ये दोनों तत्व एक दूसरे के पूरक हैं। ब्रह्मांड में ऊर्जा हर जगह निष्क्रिय रूप में व्याप्त है, जब उसमें चेतन रूपी ज्ञान का समावेश होता है तभी वह जागृत होकर क्रियात्मक रूप से प्रकट होता है। चूंकि ऊर्जा के स्वभाव के अनुरूप उसका प्रत्यारोपण एवं रूपांतरण किया जा सकता है इसीलिए ज्ञान अंश विस्तार करके ही मनुष्य ने ऊर्जा को रूपांतरित करके जगत की प्रगति हेतु भौतिक संसाधनों का सृजन किया अर्थात मनुष्य की आवश्यकताओं हेतु तमाम भौतिकीय संसाधनों का निर्माण हुआ। इसी प्रकार बिना ऊर्जा के चेतन सुसुप्तावस्था में रहता है। जगत में चेतन तत्व स्थिर है तथा बिना ऊर्जा तत्व के चेतन रूपी ज्ञान का संसार में कोई अस्तित्व नहीं है। चूंकि ऊर्जा का अभिप्राय शक्ति से है इसीलिए वेदो-पुराणों में कहा गया है कि बिना शक्ति के शिव 'शव' के समान हैं।

पुरुष अर्थात चेतन तत्व जहां स्थिर स्वरूप में है, वहीं पुरुष तत्व के ज्ञान रूपी इच्छाओं की पूर्ति हेतु पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश) रूपी प्रकृति मनुष्य के कर्म

अर्थात जीवन यात्रा के लिए वातावरण का निर्माण करते हैं। साथ ही इन पंच तत्वों की ऊर्जा मनुष्य के कर्मों का प्रारब्ध भी तय कर देती है अर्थात ऊर्जा यथापरिस्थिति अपने अंदर बदलाव कर के भाव के तहत सदैव अपनी संतानों की इच्छाओं की पूर्ति हेतु निःस्वार्थ रूप से पूर्णतः समर्पित रहती है इसीलिए इसे माता आदिशक्ति स्वरूपा दुर्गा कहा गया है। मनुष्य शरीर की बात करें तो माता आदिशक्ति की यह ऊर्जा मनुष्य के शरीर में शक्ति चक्रों के रूप में स्थापित होकर मनुष्य शरीर का संचालन करती रहती है। चूंकि संसार में करोड़ों-अरबों

की संख्या में जीव जन्तु एवं मनुष्य के भावों एवं स्वभावों से प्राकृतिक वातावरण प्रभावित होता रहता है, इसके अतिरिक्त मनुष्य का शरीर जो की भौतिक जगत का हिस्सा है और इस शरीर का झुकाव भी मनुष्य की इच्छाओं के अनुरूप सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति हेतु अधिक आसक्त होता रहता है जिससे उसके शरीर की प्रकृति अर्थात शरीर के संचालक पंचमहाभूत तत्वों में भी असंतुलन होता रहता है। चूंकि मनुष्य शरीर अन्नमय कोष का हिस्सा है इसलिए पंचमहाभूत के असंतुलन से व्यक्ति के आचार एवं विचार पर उसका असर पड़ता है जिससे उसके शक्ति रूपी ऊर्जा चक्र भी प्रभावित होते है, इसीलिए वर्ष में दो बार प्रत्यक्ष तथा दो बार गुप्त नवरात्र पर्व में ऊर्जा शक्ति स्वरूपा माता दुर्गा की नौ दिनों तक आराधना में कर अपनी आंतरिक ऊर्जाओं का संतुलन स्थापित करने की परंपरा है। इस दौरान मनुष्य व्रत रहकर तामसी रहन-सहन एवं खान-पान से दूरी बनाकर अपना ध्यान माता आदिशक्ति रूपी दुर्गा जी की पूजा-पाठ में लगाता है जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य में विभिन्न प्रकार की भौतिक इच्छाओं-आकांक्षाओं तथा आसक्ति से उत्पन्न तामसिक गुणों की वृद्धि का संतुलन होता है. इसके साथ ही नौ दिन तक शक्ति की आराधना करने से मन एका भाव से मनुष्य शरीर के अंदर आध्यात्मिक शक्तियों का विकास होता है जिससे मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्यों अर्थात परम तत्व की प्राप्ति हेतु सहायता मिलती है। नवरात्र पर्व का संबंध सूर्य के काल में ऋतुओं की संधि से भी है। इन दिनों एक ऋतु का समापन और दूसरी ऋतु का प्रारम्भ होता है जिसके फलस्वरूप प्रकृति में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं तथा र अत्र भी पक कर खेतों से घर आता हैं, इस ऋतु बदलाव के कारण वायुमंडल में विभिन्न प्रकार के संक्रमण की उत्पत्ति होती है, इन संक्रमण से सुरक्षा करने, अनमय कोष प्रधान शरीर को ऊर्जामय रखने तथा शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए नवरात्र पर्व का आयोजन किया जाता है। इस पर्व का आयोजन पूर्ण भक्ति भाव एवं श्रद्धा से हम सभी मनुष्यों को करना चाहिए ताकि अपने मन ● रूपी ऊर्जा में तमस वातावरण का स्तर कम हो. साथ ही प्रत्येक मनुष्य तथा जनमानस में आध्यात्मिक शक्तियों का विकास हो। नवरात्र के इस पर्व से सत, रज एवं तमस गुणों का संतुलन होता हैं तथा जीवन के परम उद्देश्यों की प्राप्ति का यही सुगम मार्ग है।

चूंकि मनुष्य शरीर अन्नमय कोष का हिस्सा है इसलिए पंचमहाभूत के असंतुलन से व्यक्ति के आचार एवं विचार पर उसका असर पड़ता है जिससे उसके शक्ति रूपी ऊर्जा चक्र भी प्रभावित होते हैं, इसीलिए वर्ष में दो बार प्रत्यक्ष तथा दो बार गुप्त नवरात्र पर्व में ऊर्जा शक्ति स्वरूपा माता दुर्गा की नौ दिनों तक आराधना कर अपनी आंतरिक ऊर्जाओं का संतुलन स्थापित करने की परंपरा है। इस दौरान • मनुष्य व्रत रहकर तामसी रहन-सहन एवं खान-पान से दूरी बनाकर अपना ध्यान माता आदिशक्ति रूपी दुर्गा जी की पूजा-पाठ में लगाता है जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य में विभिन्न प्रकार की भौतिक इच्छाओं-आकांक्षाओं तथा आसक्ति से उत्पन्न तामसिक गुणों की वृद्धि का संतुलन होता है

पुनर्जीवन का पर्व

चैत्र प्रतिपदा यानी गुड़ी पड़वा, अपना न्यू ईयर, नवीनता का पर्व हम यह मानते हैं कि दुनिया इसी रोज बनी थी। यह हमारा नया साल है, लेकिन अपना यह नववर्ष रात के अंधेरे में नहीं आता। हम नववर्ष पर सूरज की पहली किरण का स्वागत करते हैं। जबकि पश्चिम में पुष्प अंधेरे में नए साल की अगवानी होती है। •हमारे नए साल का तारीख से उतना संबंध नहीं है, जितना मौसम से है उसका आना सिर्फ कैलेंडर से पता नहीं चलता। प्रकृति झकझोरकर हमें चौतरफा फूट रही नवीनता का अहसास कराती है। पुराने पीले पत्ते पेड़ से गिरते हैं। नई कॉपले फूटती हैं। प्रकृति अपने शृंगार की प्रक्रिया में होती है। लाल, पीले, नीले, गुलाबी फूल खिलते हैं। ऐसा लगता है कि पूरी की पूरी सृष्टि नई हो गई है। नव गति, नव लय, ताल, छंद, नवः सच नवीनता से लबालब जो कुदरत के इस खेल को नहीं समझते, वे न समझे। जो नहीं समझे, उनके लिए फरहत शहजाद की एक गजल भी है, जिसे मेहदी हसन ने गाया था-कोपलें फिर फूट आई शाख पर कहना उसे योन समझा है, न समझेगा मगर कहना उसे

हम दुनिया में सबसे पुरानी संस्कृति के लोग हैं इसलिए समझते हैं कि ऋतुचक्र का घूमना ही शाश्वत है, जीवन है। तभी हम इस नए साल के आने पर वैसी उछल-कूद नहीं करते, जैसी पश्चिम में होती है। हमारे स्वभाव में इस परिवर्तन की गरिमा है। हम साल के आने और जाने दोनों पर विचार करते हैं पतझड़ और बसंत साथ-साथ इस व्यवस्था के गहरे संकेत हैं। आदि अंत, अवसान आगमन, मिलना बिछुड़ना, पुराने का खत्म होना, नए का आना सुनने में चाहे भले यह असगत लगे। पर हैं साथ साथ, एक ही सिक्के के दो पहलू जीवन का यही सार हमारे नए साल का दर्शन है। काल को पकड़ उसे बांटने का काम हमारे पुरखों ने सबसे पहले किया काल को बांट दिन, महीना, साल बनाने का काम भारत में ही शुरू हुआ जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर भी मानते हैं आकाश मंडल की गति, ज्ञान, काल निर्धारण का काम पहले पहल भारत में हुआ था। ऋग्वेद कहता है, ऋषियों ने काल को बारह भागों और तीन सौ साठ अंशों में बांटा है। वैज्ञानिक चिंतन के साथ हुए इस बंटवारे को बाद में ग्रेगेरियन कैलेंडर ने भी माना। आर्यभट्ट भास्कराचार्य, बराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त ने छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी काल की इकाई को पहचाना। बारह महीने का साल और सात रोज का सप्ताह रखने का रिवाज विक्रम संवत से शुरू हुआ। वीर विक्रमादित्य उज्जयिनी का राजा था शकों को जिस रोज उसने देश से खदेड़ा, उसी रोज से विक्रम संवत बना। इतिहास देखने से लगता है कि कई विक्रमादित्य हुए। बाद में यह पदवी हो गई। पर लोकजीवन में उसकी व्यासि न्यायपाल के नाते ज्यादा है। उसकी न्यायप्रियता का असर उस सिंहासन पर भी आ गया था, जिस पर वह बैठता था जो उस सिंहासन पर बैठा, गजब का न्यायप्रिय हुआ लोक में शकों से विक्रमादित्य के युद्ध की कथा नहीं, उसके सिंहासन की चलती है।

विक्रम संवत से 6667 ईसवी पहले सप्तर्षि संवत यहां •सबसे पुराना संवत माना जाता था। फिर श्रीकृष्ण जन्म से कृष्ण कैलेंडर उसके बाद कलि संवत आया विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसा पूर्व में हुई। इसके बाद 78 ईसवी में शक -संवत शुरू हुआ। भारत सरकार ने शक संवत को ही माना है। विक्रम संवत की शुरुआत सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से मानी जाती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चंद्रमा का ट्रांजिशन' शुरू होता है इसलिए चैत्र प्रतिपदा चंद्रकला का पहला दिन होता है। चंद्रवर्ष 354 दिन का होता है। यह भी चैत्र से शुरू होता है। सौरमास में 365 दिन होते हैं। दोनों में हर साल दस रोज का अंतर आ जाता है। ऐसे बढ़े हुए दिनों को ही 'मलमास' या' अभिमास' कहते हैं। कागज पर लिखे इतिहास से नहीं, परंपरा से हमारी दादी वर्ष प्रतिपदा से ही नया वर्ष मानती थीं यही संस्कार मुझमें हैं। थीं। जिस कारण मैं अपने बच्चों को आज भी तिथि ज्ञान देता रहता हूँ। हमारी परंपरा में नया साल खुशियां मनाने का नहीं, प्रकृति से मेल बिठा खुद को पुनर्जीवित करने का पर्व है। तभी तो नए साल के मौके पर नीम की कोपले काली मिर्च के साथ चबाने का खास महत्व था ताकि साल भर हम संक्रमण या चर्मरोग से मुक्त रहें। इस बड़े देश में हर वक्त, हर कहीं एक सा मौसम नहीं रहता। इसलिए अलग-अलग राज्यों में स्थानीय मौसम में आने वाले बदलाव के साथ नया साल आता है। वर्ष प्रतिपदा भी अलग अलग जगह थोड़े अंतराल पर मनाई जाती है। कश्मीर में इसे 'नवरोज' तो आंध्र और कर्नाटक में 'उगादि' महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा', केरल में 'विशु' कहते हैं। सिंधी इसे 'झूलेलाल जयंती' के रूप में चेटीचंड' के तौर पर मनाते हैं। तमिलनाडु में 'पोंगल', बंगाल में 'पोएला बैसाख और गुजरात में दीपावली पर नया साल मनाते हैं। कहते हैं- ब्रह्मा ने चैत्र प्रतिपदा के दिन ही दुनिया बनाई। भगवान राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। महाराज पुधिष्ठिर भी इसी दिन गद्दी पर बैठे थे छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू पद पादशाही की स्थापना इसी दिन की परंपरा से धड़कते 'पीएला वैशाख' की महिमा लाल से लाल मार्क्सवादी से भी मानते है। बंगाल की संस्कृति में रचे बसे इस पर्व के रास्ते में कभी मार्क्स ने बाधा नहीं डाली। सैकड़ों सालों तक भारत में विभिन्न प्रकार के संवत प्रयोग में आते रहे। इससे काल निर्णय में अनेक भ्रम हुए। अरब यात्री अलबरूनी के यात्रा वृत्तांत में पांच संवतों का जिक्र है। श्रीहर्ष विक्रमादित्य, शक, वलभ और गुरु संवत प्रो. पांडुरंग वामन काणे अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में लिखते हैं- 'विक्रम संवत के बारे में कुछ कहना कठिन है।

नवरात्रि में माता रानी का आशीर्वाद पाने के लिए पढ़ें ये स्तोत्र

पूजन में माँ नवरात्रि कथा, दुर्गा चालीसा, आरती और श्रीदुर्गा सप्तशती पाठ करने का विशेष महत्व है। नवरात्रि में कलश स्थापना के बाद श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

हिन्दू धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इन दिनों में नवदुर्गा की पूजा आराधना करने से माँ मनवाँछित फल की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि श्रीदुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं जिनमें माँ दुर्गा की महिमा का वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि दुर्गा सप्तशती का पाठ विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। हालाँकि, अगर आप व्यस्तता के कारण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने में असक्षम हैं तो सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् का पाठ कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से पूरे दुर्गा सप्तशती के पाठ के बराबर ही फल मिलता 

शिव उवाच
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत ॥ 1 ॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेनस्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम् । पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥

॥ अथ मन्त्रः ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ॥

ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि । 
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥ 

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि । जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥ 2 ॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी । विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीर वरी। क्रां क्रीं क्रू कालिका देवि शां शीं शृं मे शुभं कुरु ॥ 5 ॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी । भ्रां भ्रीं भू भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥ 

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥ 7 ॥ 

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥8॥ 
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे। अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत
न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ ॥ 
इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

सा ल की बड़ी उजागर चैत्र नवरात्रि 2 अप्रैल से शुरू होगी। चैत्र नवरात्रि का महत्व सबसे ज्यादा इसलिए है कि ब्रह्माजी ने इस दिन से सृष्टि निर्माण की शुरुआत की थी। इसी दिन से नया साल संवत् 2079 की शुरुआत होगी। भक्त नए साल की शुरुआत करेंगे। ज्योतिषियों का कहना है कि यह नवरात्रि खास ग्रह योग-संयोग के कारण मनोकामना पूर्ति करेगी तथा साधकों को सिद्धि देगी।

देवी की आराधना से चैत्र नवरात्रि में होगी मां शक्ति की आराधना

चैत्र नवरात्रि पूरे नौ दिन रहेगी। चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 2 अप्रैल शनिवार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होगी। ज्योतिषविद् अर्चना सरमंडल के अनुसार बुद्धादित्य योग स्वयं की राशि मकर में शनि देव मंगल के साथ रहेंगे, जो पराक्रम में वृद्धि करेंगे। रवि पुष्य नक्षत्र के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग नवरात्रि को स्वयं सिद्ध बनाएंगे। शनिवार से नवरात्रि का प्रारंभ शनिदेव का स्वयं की राशि मकर में मंगल के साथ रहना निश्चित ही सिद्धि कारक है। इससे कार्य में सफलता, मनोकामना की पूर्ति, साधना में सिद्धि मिलेगी। 9 दिनों में देवी के 9 रूपों की पूजा होती है। एकम शैलपुत्री, द्वितीया- ब्रह्मचारिणी, तृतीया-चंद्रघंटा, चतुर्थी कुष्मांडा, पंचमी-स्कंद माता, षष्ठी कात्यायनी, सप्तमी कालरात्रि, अष्टमी-महागौरी, नवमी- सिद्धिदात्री का विध-विधान से भक्तों द्वारा पूजन किया जाता है।

शक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्रि साल में 4 बार आता है- चैत्र, आषाढ़ व अश्विन माघ। चैत्र और अश्विन मास की नवरात्रि उजागर नवरात्रि है, शेष दो नवरात्रि गुप्त नवरात्रि कही जाती हैं। चैत्र नवरात्र में देवी के नौ रूपों का पूजन किया जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार नवरात्र का धार्मिक महत्व इसलिए भी है कि नवरात्रि के पहले दिन आद्यशक्ति प्रकट हुई थी। देवी के कहने पर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को सूर्योदय के समय ही ब्रह्माजी ने सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की थी। इसीलिए चैत्र नवरात्रि को सृष्टि के निर्माण का उत्सव भी कहा जाता है। इसी तिथि से हिंदू नववर्ष शुरू होता है। चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार भी लिया था। इसके बाद भगवान विष्णु का सातवां अवतार भगवान राम का है, वह भी चैत्र नवरात्रि में हुआ था। इसीलिए चैत्र नवरात्र का ज्यादा बड़ा महत्व है।

मकर राशि में शनि, मंगल के साथ विराजित । कुंभ में गुरु, शुक्र के साथ विराजित मीन में सूर्य, बुध के साथ विराजित मेष में चंद्रमा, वृषभ में राहु, वृश्चिक में केतु विराजमान रहेंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार श्रीमद् देवी भागवत व वराह पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर सृष्टि का आरंभ हुआ था। यही कारण है कि देवी पुराण में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा शनिवार के दिन रेवती नक्षत्र, ऐंद्र योग, बव करण तथा मेष राशि के चंद्रमा की साक्षी में आ रही है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ग्रह नक्षत्रों का विशेष महत्व है। किस दिन किस नक्षत्र का संयोग बनने से क्या विशेष योग बन रहा है इस संबंध में ऋषि महर्षि ने अपने मत प्रस्तावित किए हैं। मुहूर्त ग्रंथों में पंचक के नक्षत्र में शुरू होने वाले विशिष्ट व्रत, त्यौहार का विशेष महत्व बताया गया है। इस बार चैत्र नवरात्र रेवती नक्षत्र में शुरू हो रही है। यह पंचक का नक्षत्र है, इस नक्षत्र में देवी आराधना की शुरुआत करने से भक्त को पांच गुना अधिक शुभफल प्राप्त होता है।

नवरात्रि संस्कृत के 2 शब्दों नव और रत्रि से बना है, जिसका अर्थ है 9 रातें। नवरात्रि के इन 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है। सालभर में 4 नवरात्रि आती हैं, जिनमें चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि का अधिक महत्व बताया गया है। चैत्र नवरात्रि मार्च-अप्रैल में आती हैं और शारदीय नवरात्रि सितंबर-अक्टूबर के बीच आती हैं। माना जाता है कि नवरात्रि में माता की पूजा-अर्चना करने से देवी दुर्गा की खास कृपा होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, नवरात्रि के दौरान कुछ कामों को करने से बचना चाहिए। कहा जाता है कि अगर कोई नवरात्रि में इन कामों को करता है तो उसे दरिद्रता के साथ-साथ कई मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। तो आइए अब उन कामों के बारे में भी जान लीजिए, जिन्हें नवरात्रि के दौरान करने से बचना चाहिए।

नवरात्रि के 9 दिनों के दौरान नाखून काटने की मनाही होती है। आपने देखा भी होगा कि कई लोग नवरात्रि शुरू होने के पहले ही नाखून काट लेते हैं, ताकि 9 दिनों में नाखून काटने की जरूरत न पड़े। कहा जाता है कि ऐसा करने से देवी क्रोधित हो जाती हैं और फिर उनके क्रोध का सामना करना पड़ता है। इसलिए ऐसा करने से बचें। नवरात्रि के दौरान कटिंग और शेविंग कराने से बचें। कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बाल कटवाने से भविष्य में सफल होने की संभावना कम हो जाती हैं। इसलिए 9 दिनों तक बाल और बियर्ड कटवाने से बचें। 9 दिनों में देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। इन 9 दिनों तक देवी भक्त उपवास रखते हैं और देवी की पूजा करते हैं। इसलिए नवरात्रि के दौरान सभी प्रकार के नॉनवेज फूड खाने से बचना चाहिए। प्याज और लहसुन, तामसिक भोजन के रूप में आते हैं। तामसिक का मतलब है कि प्याज-लहसुन मन और शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। माना जाता है कि वे मानसिक थकान का कारण भी बनते हैं। नवरात्रि के दौरान तामसी खाद्य पदार्थों का सेवन करना अच्छा नहीं माना जाता। इसलिए 9 दिनों तक सात्विक भोजन करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी पवित्र समारोह या त्योहार के दौरान शराब के सेवन से पूरी तरह बचना चाहिए। चैत्र नवरात्रि देवी मां की आराधना के लिए सबसे पवित्र माने जाते हैं, इसलिए नवरात्रि पूजा के 9 दिनों के दौरान शराब का सेवन नहीं करना चाहिए।

चमड़े के बेल्ट, जूते, जैकेट, ब्रेसलेट आदि पहनने से बचना चाहिए। इसके पीछे का कारण है कि चमड़ा जानवरों की खाल से बना होता है और इसे अशुभ माना जाता है। इसलिए नवरात्रि में लेदर से बनी चीजों को पहनने से बचना चाहिए। नवरात्रि के दौरान किसी से भी अशुभ या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। इसका कारण है कि नवरात्रि देवी की भक्ति और आराधना करने का समय होता है। अगर इस दौरान गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो देवी मां क्रोधित हो सकती हैं। इसलिए ऐसा करने से बचें।

● ओम





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