हम क्यों भूलते जा रहे हैं विक्रम संवत् ?

राजशेखर व्यास

वि क्रम संवत्' के दो हजार वर्ष का समाप्त होना भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी धूमिल अतीत में विक्रम के स्मारक स्वरूप जिस विक्रम संवत् का प्रवेतन हुआ था, उसके पथ की वर्तमान रेखा यद्यपि अंधकार में डूबी है, परंतु इस डोर के सहारे हम अपने आपको उस श्रृंखला के क्रम में पाते हैं, जिसके अनेक अंश अत्यंत उज्ज्वल एवं गौरवमय रहे हैं। ये दो हजार वर्ष तो भारतीय इतिहास के उत्तरकाल के ही अंश है। विक्रम के उद्भव तक विशुद्ध वैदिक संस्कृति का काल, रामायण और महाभारत का युग, महावीर और गौतम बुद्ध का समय, पराक्रम सूर्य चंद्रगुप्त मौर्य एवं प्रियदर्शी अशोक का काल, अंततः पुष्यमित्र शुंग की साहस गाथा सुदूरभूत की बातें बन चुकी थीं वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, सूत्र ग्रंथ एवं मुख्य स्मृतियों की रचना हो चुकी थी। वैयाकरण पाणिनि और पतंजलि अपनी कृतियों से पंडितों को चकित कर चुके थे और कौटिल्य की ख्याति सफल राजनीतिज्ञता के कारण फैल चुकी थी। उन पिछले दो हजार वर्षों की लंबी यात्रा में भी भारत के शौर्य ने उसकी प्रतिभा के शौर्य ने उसकी विद्वत्ता ने जो मान स्थित कर दिए हैं, वे विगत शताब्दियों के बहुत कुछ अनुरूप हैं। विक्रम संवत् के प्रथम हजारों वर्षों में हमने मात्र शिवनागों, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त, विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, यशोधर्मन, स्कंदगुप्त, यशोधर्मन, विष्णुवर्धन आदि के बल और प्रताप के सम्मुख विदेशी शक्तियों को थर-थर काँपते हुए देखा, भारत के उपनिवेश बसते देखें, भारत की संस्कृति और उसके धर्म का प्रसार बाहर के देशों में देखा कालिदास, भवभूति, भारवि, माघ आदि की काव्य प्रतिभा तथा दंड और बाण भटटू की विलक्षण लेखन-शक्ति देखी, कुमारिल भटट् और शंकराचार्य का बुद्धि-वैभव देखा और स्वतंत्रता की अग्नि को सदैव प्रज्वलित रखने वाली राजपूत जाति के उत्थान व सगंठन को देखा। हालाँकि दूसरी सहस्राब्दी में भाग्य चक्र की गति थोड़ी सी विपरीत हो गई, उसने उपनिवेशों का उजड़ना दिखाया और भारतीयों की हार तथा बहुमुखी पतन भी हमने देखा परंतु उनकी आंतरिक जीवन शक्ति का हास नहीं हुआ और हमने यह भी दिखा दिया कि गिरकर भी कैसे उठा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति के अभिमानियों के लिए यह कम गौरव की बात नहीं, आज भारतवर्ष में प्रवर्तित विक्रम संवत्सर, बुद्ध- निर्वाण काल गणना को छोड़कर संसार के प्रायः सभी प्रचलित ऐतिहासिक संवतों से अधिक प्राचीन है। 'विक्रम', 'यह था' या 'वह', यह विवाद केवल अनुसंधान प्रिय पंडितों का समीक्षार्थ विषय है। आज संपूर्ण विश्व में जिस प्रकाशपुंज की विमल-धवल कीर्ति फैल रही है, वह कहाँ से और कैसे उद्भव हो गई है, वह तो इतिहासकर्ताओं की अनुसंधानशाला तक मर्यादित है। उनसे उच्चकोटि के मानसमूह तो बरसों से 'विक्रम' को अपने हृदय में सँजोए बैठे हैं। दरअसल 'विक्रम' में हम अपने विशाल देश की परतंत्र पाश- -पीड़ा से मुक्ति दिलाने वाली समर्थ शक्ति की अभ्यर्थना करते हैं। इसकी पावन स्मृति की धरोहर संवत् वर्षकाल गणना की स्मरण मणि की तरह इतिहास की श्रृंखलाएँ भी एक-दूसरे से जुड़ी चली जाती है। विक्रम, कालिदास और उज्जयिनी हमारे स्वाभिमान, शौर्य और स्वर्णयुग के अभिमान का विषय है।

उसी उज्जयिनी में महर्षि सांदीपनी वंश में उत्पन्न पद्मभूषण, साहित्य वाचस्पति स्व. पं. सूर्यनारायण व्यास ने विक्रम संवत् के दो हजार वर्ष पूर्ण होने पर एक मासिक पत्र 'विक्रम' का प्रकाशन आरंभ किया। पं. व्यास का अपना निजी प्रेस था, जहाँ से वे अपने पंचांग का प्रकाशन करते थे। 'विक्रम' (मासिक विक्रम) का प्रकाशन एक विशेष उद्देश्य को लेकर किया गया था। विशेषकर उन दिनों जब हिंदी में चाँद, हंस, वीणा, माधुरी, सुधा, सरस्वती जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका हिंदी में सुस्थापित थी। पं. व्यास का उज्जैन जैसे छोटे से कस्बे से 'विक्रम' का प्रकाशन दुस्साहस ही कहा जाएगा। मगर 'विक्रम' तो मानो उनके बल, विक्रम, पुरुषार्थ का परिचायक ही बन गया था।

हजारों वर्षों से हमारे इतिहास को जो विकृत और धूमिल किया जा रहा था, उससे पं. व्यास मानो लोहा लेने खड़े हुए थे, अरसे से हमें पढ़ाया जा रहा था, हम मुगलों के, अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं। हम शोषित, पीड़ित और गुलामों को पं. व्यास ने एक प्रबल बल, विक्रम और पुरुषार्थ पराक्रमी नायक, चरित्र नायक संवत् प्रवर्तक सम्राट् विक्रमादित्य दिया।
और बताया कि हम आरंभ से ही परास्त, पराजित, पराभूत और शोषित नहीं रहे हैं, बल्कि 'शक' और हूणों को परास्त करने वाला हमारा नायक शकारि विक्रमादित्य विजय और विक्रम का दूसरा प्रतीक है। कालिदास समारोह के जन्म से भी पुरानी घटना है यह, जब उज्जयिनी में पं. व्यास ने विक्रम द्विसहस्राब्दि समारोह समिति का गठन कर सम्राट् विक्रम की पावन स्मृति में चार महत् उद्देश्यों की स्थापना का संकल्प लिया, वे उद्देश्य थे— विक्रम के नाम पर एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना, जो साहित्य, शिक्षा, कला, संस्कृति की त्रिवेणी हो। वे विक्रम कीर्ति मंदिर नाट्यशाला स्थापना और विक्रम स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन हो ।

इसमें कोई शक नहीं कि विक्रम द्विसहस्राब्दि की उनकी इस योजना में उनके सबसे अंतरंग स्नेह सहयोगी महाराजा जीवाजीराव सिंधिया का विशेष सहयोग रहा। 'विक्रम-पत्र' के माध्यम से जब यह योजना देश के सम्मुख पं. व्यास ने रखी थी, तब भी वे नहीं जानते थे कि उनकी इस योजना का इतना सम्यक् स्वागत होगा। विशेषकर वीर सावरकर और के. एम. मुंशीजी ने अपने पत्र 'सोशल वेलफेयर' में इस योजना का प्रारूप संपूर्ण विवरण के साथ विस्तार से प्रकाशित किया और सारे देश से इस पुण्य कार्य में पूर्ण सहयोग देने की प्रार्थना की।

महाराज देवास ने इस आयोजन के लिए सारा धन देना स्वीकार किया, मगर शर्त यह रखी गई कि सारे सूत्र उनके हाथों में रखे जाए। मगर विधि को कुछ और ही मंजूर था, पं. व्यास अपने व्यक्तिगत कार्यवश मुंबई गए और वहां मुंशीजी से मिलकर योजना पर विस्तार से चर्चा की, तभी महाराजा सिंधिया का उन्हें निमंत्रण मिला महाराजा जीवाजीराव सिंधिया ने पंडित व्यास को बताया कि वे इस योजना को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते हैं और इस कार्य को एक समिति बनाकर आगे बढ़ाना चाहिए, यह चर्चा कुछ ही क्षणों में हो गई जब पं. व्यास महाराज से मिलकर कक्ष से बाहर ही निकले थे कि महाराज ने पुनः आवाज दी और विस्तार से चर्चा का पुनः आमंत्रण दिया। अगली मुलाकात दो-चार मिनट भी नहीं, लगभग ढाई घंटे की हुई और इस चर्चा ने तो सारी रूपरेखा ही बदल दी, जो कल्पना की गई थी उससे व्यापक रूप से समारोह करने की बात तय हुई और इस तरह पं. तब से जो आत्मीयता उन दोनों के मध्य स्थापित हुई थी, वह अंत व्यास सप्ताह भर ग्वालियर रुके और रोजाना घंटों घंटों विचार विनिमय तक बनी रही। बाद के बाद के दिनों में पृथ्वीराज कपूरजी ने 'कालिदास हुआ महाराज से पं. व्यास का अंतरंग आत्मीय संबंध यों तो सन् १९३४ समारोह में अपनी नाटक मंडली को लाकर स्वयं नाटक भी किए और से था। मगर इस संबंध में ज्योतिष ही प्रमुख कड़ी था। यह पहला अवसर अपने से होने वाली सारी आय कालिदास समारोह के लिए प्रदान कर दी। था, जब उन्होंने एक विशिष्ट विषय पर उनसे चर्चा की थी।

महाराजा का विचार 'विक्रम उत्सव' के लिए पचास लाख की धनराशि एकत्र कर अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य आरंभ करना था, विश्वविद्यालय के लिए धनराशि शासन की और से दी जानी थी। इसके सिवा उज्जैन के प्रमुख धार्मिक स्थान और ऐतिहासिक स्थानों के सुधार के लिए शासन की ओर से धनराशि दी जानी थी। इसके सिवा उज्जैन के प्रमुख धार्मिक स्थान और ऐतिहासिक स्थानों के सुधार के लिए शासन के अनेक विभागों द्वारा सहयोग देने का निश्चय किया गया। तदनुसार महाकाल मंदिर, हरसिद्धि मंदिर और क्षिप्रातट पर सुधार कार्य आरंभ हो गए थे। जहाँ जहाँ यह सुधार कार्य हुए, वहाँ पं. व्यास ने, जो स्वयं संस्कृत के सुकवि थे, यह श्लोक अंकित करवा दिया था-"द्वि सहस्रमिते वर्षे चैत्रे विक्रम संवत्सरे, महोत्सव सभा सम्यक् जीर्णोद्धारमकारयत्। "



जैसे-जैसे समारोह का कार्य प्रगति कर रहा था, देश के विभिन्न भागों में एक सांस्कृतिक वातावरण बन गया था।  लगभग उसी समय पत्र पत्रिकाओं में रवींद्र बाबू और निराला ने भी 'विक्रम' पर कविताओं का सृजन किया था- रवींद्र बाबू की दूर बहुत दूर क्षिप्रातीरे और निराला की द्विसहस्राब्दि' कविता पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है। हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष के समर्थन और सहयोग से सारे देश में चेतना फैली थी। इसी दरम्यान मियाँ जिन्ना ने अपने एक भाषण में इस उत्सव का विरोध किया। जिन्ना के विरोध से सरकार के भी कान खड़े हो गए, चूँकि वह समय भी ऐसा था, विश्व युद्ध के आसार सामने थे, ब्रिटिश सरकार चौकन्नी हो गई। उन्हें पं. व्यास के इस आयोजन में क्रांति या विद्रोह की बू दिखी, क्योंकि एक साथ ११४ देशी महाराजा एक जगह विक्रम उत्सव के नाम पर इकट्ठा हो रहे थे, निस्संदेह इस पर्व रंग में पं. व्यास की यह परिकल्पना भी छुपी थी शौर्य और विक्रम उत्सव के इस उत्सव के अवसर पर हमारे खोए बल, पराक्रम की चर्चा देशी राजाओं के रक्त में उबाल अवश्य ले आएगी। वैसे इस आयोजन में हिंदू-मुस्लिम भेदभाव को कोई जगह नहीं थी, किंतु जिन्ना के विरोध से वातावरण में विकार पैदा हो गया। उस समय पं. व्यास ने नवाब भोपाल को शासकीय स्तर पर समारोह मनाने के लिए लिखा। नवाब ने अपने कैबिनेट में योग्य विचार करने का आश्वासन दिया। चेतना फैल रही थी, जागृति फैल रही थी। मुंबई में बड़े पैमाने पर यह समारोह आयोजित किया गया। देश की हजारों सभा-संस्थाओं ने समारोह की तैयारी की।

लगभग उसी समय प्रख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट ने पं. व्यास के आग्रह पर विक्रमादित्य' सिनेमा का निर्माण आरंभ किया, जिसके संवाद, पटकथा और गीत-लेखन का कार्य भी उन्होंने व्यासजी के परामर्श से किया। इस फिल्म में विक्रमादित्य' की मुख्य भूमिका भारतीय सिनेमा जगत् के महानायक पृथ्वीराज कपूर ने निभाई थी। पृथ्वीराजजी उस समय पं. व्यास के आवास ' भारती भवन' में ही ठहरे थे।

विक्रम कीर्ति मंदिर का निर्माण कर उसमें पुरातत्त्व संग्रहालय, चित्रकला कक्ष, प्राचीन ग्रंथ संग्रहालय आदि रखने का निश्चय किया गया। कुछ समय बाद ही रियासतों का विलनीकरण हुआ, मध्य भारत का निर्माण हुआ और वि. के निर्माण को लेकर अनेक उलझन, प्रपंच और अड़ंगे लगाए गए। चूँकि उस वक्त इंदौर और भोपाल तक में विश्वविद्यालय नहीं थे, अत: वहाँ के अखबारों और स्वार्थी राजनेताओं ने पं. व्यास के इस महान् कार्य में असंख्य बाधाएँ उपस्थित कीं।

उज्जियनी में प्रति वर्ष १२ वर्षों में सिंहस्थ पर्व मनाया जाता है। १९४५ में जब सिंहस्थ पर्व आया, तब देश भर के असंख्य आचार्य, संत-साधु संत-महंत उज्जयिनी आए, तब पं. व्यासजी ने अपने व्यक्तिगत संपकों से प्रयास कर उन्हीं के नेतृत्व में 'विक्रम महोत्सव' तीन रोज तक मनाया। साधु-संतों के १२१ हाथियों, लाजमों, लवाजमों के साथ लाखों लोगों की उपस्थिति में ३ दिनों तक भव्य आयोजन महत् पैमाने पर मनाया गया। देश भर में विक्रमादित्य का बहुत सा साहित्य विविध भाषाओं में प्रकाशित हुआ देश भर में सांस्कृतिक लहर आ गई। विक्रम द्विसहस्राब्दि समारोह समिति' ने भी 'विक्रम स्मृति ग्रंथ' का प्रकाशन ही मौजूद है। किया जैसा कि प्रायः महाभारत के बारे में कहा जाता है कि जो महाभारत में है, वही भारत में हैं और जो महाभारत में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है। वैसा ही वृहदाकार ३ भाषाओं में यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ।

क्या किसी नगर के इतिहास में यह कम महत्त्वपूर्ण घटना है कि पद और अधिकार से वंचित एक व्यक्ति ने एक पूरे शहर को एक युग से दूसरे युग में रख दिया। व्यासजी ने विक्रम, कालिदास या उज्जयिनी के नाम पर मंदिर मठ नहीं बनवाए, अपितु शिक्षा अनुसंधान और कला संस्कृति के शोध संस्थान और विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया। आज के विक्रम वि.वि. के कुलपति भी शायद यह नहीं जानते कि विक्रम वि.वि. बना कैसे ? वे पं. व्यास का नाम हटाकर विक्रम को चक्रम में पहले ही बदल चुके हैं। विक्रम आज उनके भ्रष्टाचार से ग्रस्त त्रस्त है।

हालाँकि व्यासजी यह प्रक्रिया समाज को भरने के प्रयास में खुद को खाली करने की रही। आज जब भारत को आजाद हुए ७२ वर्ष से भी ऊपर होने जा रहे हैं, आज भी हम अपने सांस्कृतिक साहित्यिक मूल्यों

और अवदानों से हम कितने अपरिचित हैं तरस आता है कि हमारे राष्ट्र के कर्णधारों पर, जो राष्ट्र को २१वीं शताब्दी में तो ले जाने की बात करते हैं। वे ईसा सन्- संवत् से तो सोचते हैं, संभवतः इन 'शक' और 'हूण' वंशजों को यह ज्ञात नहीं होगा कि हम २१वीं शताब्दी में बहुत पहले से

'हिंदुस्तान' एवं 'पंजाब केसरी', 'नई दुनिया' इस देश में ऐसे राष्ट्रीय समाचार पत्र हैं, जो अपने मुखपृष्ठ पर विक्रम संवत् को ही प्रमुखता देते आए हैं। मेरे व्यक्तिगत अनुरोध को स्वीकार कर स्व. राजेंद्र माथुर (तत्कालिन संपादक) ने 'नवभारत टाइम्स' के मुख्य पृष्ठ पर विक्रम संवत् देना आरंभ कर दिया था। मगर अभी भी कानों में कोई पिघला हुआ सीसा डालता है, जब हम प्रातः आकाशवाणी से रेडियो के कान उमेठते ही सुनते हैं, आज दिनांक है। तदनुसार शक संवत्" ।

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