06. षष्ठम् नवरात्र पूजा || कात्यायनी चरित + षष्ठम् व सप्तम् अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

06. षष्ठम् नवरात्र पूजा || कात्यायनी चरित ||
                           एवं 
षष्ठम् व सप्तम्  अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

षष्टम कात्यायनी


माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। नवरात्रि में छठवें दिन अर्थात षष्ठी को माँ कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य तथा दिव्य है। इनका शरीर स्वर्ण के समान दैदिप्यमान है। ये भी चार भुजाएँ धारण करने के कारण चतुर्भुजाधारी कहलाती हैं। माँ कात्यायनी की ऊपर वाली दाहिनी भुजा अभय मुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा वर मुद्रा में उठी हुई हैं। इन्होने अपनी ऊपर वाली बाई भुजा में तलवार तथा नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प धारण कर रखा है। इनका वाहन भी सिंह है। देवी कात्यायनी का मंत्र ‘ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ कात्यायनी दैव्यै नमः।’ है।

श्रुतियों के अनुसार कत नाम के प्रसिद्ध ऋषि के पुत्र का नाम कात्य था। उन्ही के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन का जन्म हुआ था। उन्होने भगवती जगदम्बा को अपनी पुत्री के रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की। भगवती जगदम्बा ने उनको दर्शन देकर उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। कालांतर में जब महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार बढ़ गए तो उनका विनाश करने के लिए त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश) ने अपने अपने तेज और प्रताप का अंश देकर इन देवी को उत्पन्न किया था। इसके उपरांत देवी ने अपने संपूर्ण अंश सहित महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया। महर्षि कात्यायन के घर जन्म लेने के कारण ये देवी कात्यायनी कहलायीं।

अश्विन कृष्ण चतुर्दशी को देवी के जन्म लेने के बाद कात्यायन ऋषि ने शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों में इनकी पूजा की, पूजा ग्रहण करने के उपरांत दशमी को देवी कात्यायनी ने महिषासुर का वध किया। 

साधक का मन इस दिन आज्ञा चक्र में अवस्थित हो जाता है। आज्ञा चक्र में स्थित साधक देवी कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। अपना सर्वस्व माता को अर्पित करने पर माता साधक पर प्रसन्न हो दर्शन देती हैं। इनके सानिध्य में रहकर साधक सहजरूप से माँ की कृपा, धर्म, अर्थ, कर्म, काम, मोक्षादि को प्राप्त कर लेता है। अतः माँ कात्यायनी की पूजा अमोघ फल देने वाली है।

कहा जाता है कि ब्रज की गोपियों ने भी श्री कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए यमुना के तट पर इन्ही देवी की पूजा की थी इसलिए ये ब्रज की अधिष्ठात्री देवी के रूप में आज भी प्रतिष्ठित हैं। ये अपने साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने के साथ ही उसके रोग, शोक, संताप और भय आदि को नष्ट कर देती है। इनकी उपासना साधक को परमपद का अधिकारी बनाती है। इसलिए साधक को इनकी साधना में रत रहना चाहिए।


माँ कात्यायनी मंत्र

चन्द्र-हास-उज्जवल-करा शाईल-वरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्या-द्देवी दानव-घातिनी।।
या देवी सर्व-भू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माँ कात्यायनी ध्यान

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घ-कृत शेखराम्।
सिंहा-रूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥

स्वर्णा-आज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रि-नेत्राम्।
वराभीत करां षग-पद-धरां कात्यायन-सुतां भजामि॥

पटाम्बर परि-धानां स्मेर-मुखी नाना-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्न-कुण्डल मण्डिताम्॥

प्रसन्न-वदना पञ्वा-अधरां कांत-कपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रि-वली-विभूषित निम्न नाभिम॥

माँ कात्यायनी स्तोत्र

कंचन-आभा वरा-भयं पद्म-धरा मुकट-उज्जवलां।
स्मेर-मुखीं शिव-पत्नी कात्यायने-सुते नमो-अस्तुते॥

पटाम्बर परि-धानां नाना-अलंकार भूषितां।
सिंह-स्थितां पदम-हस्तां कात्यायन-सुते नमो-अस्तुते॥

परमानन्द-मयी देवि पर-ब्रह्म परम-आत्मा।
परम-शक्ति, परम-भक्ति, कात्यायन-सुते नमो-अस्तुते॥

माँ कात्यायनी कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहा-स्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी   हृदयं  पातु  जया  भग-मालिनी॥

माँ कात्यायनी बीज मंत्र:-

क्लीं श्री त्रिनेत्राय नमः


बीज मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करे। माँ के बीज मंत्रो का जाप करने से आप स्वयं के अंदर एक शक्ति का अनुभव करते है एवं माँ की कृपा से आपके कार्य पूर्ण होने लगते है।

माँ कात्यायनी भोग

माँ कात्यायनी को शहद का भोग लगाएं। जिससे आपकी आकर्षण शक्त्ति का विकास होगा


छठा अध्याय - "धूम्रलोचन वध"
(श्री दुर्गा सप्तशती) 
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥
ॐ नागाधीश्‍वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्‍नावली-
भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां
सर्वज्ञेश्‍वरभैरवाङ्‌कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥

।। ध्यान ।।

मैं सर्वज्ञेश्वर भैरवके अंकमें निवास करनेवाली परमोत्कृष्ट पद्मावती देवीका चिन्तन करता (करती) हूँ। वे नागराजके आसनपर बैठी हैं, नागोंके फणोंमें सुशोभित होनेवाली मणियोंकी विशाल मालासे उनकी देहलता उद्भासित हो रही है। सूर्यके समान उनका तेज है, तीन नेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे हाथोंमें माला, कुम्भ, कपाल और कमल लिये हुए हैं तथा उनके मस्तकमें अर्धचन्द्रका मुकुट सुशोभित है।

“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः।
समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्॥२॥
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः।
सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्॥३॥
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः।
तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्॥४॥
तत्परित्राणदः कश्‍चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः।
स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥५॥

ऋषि कहते हैं – 
देवीका यह कथन सुनकर दूतको बड़ा अमर्ष हुआ और उसने दैत्यराजके पास जाकर सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया। दूतके उस वचनको सुनकर दैत्यराज कुपित हो उठा और 

दैत्यसेनापति धूम्रलोचनसे बोला
“धूम्रलोचन ! तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और उसके केश पकड़कर घसीटते हुए उसे बलपूर्वक यहाँ ले आओ। उसकी रक्षा करनेके लिये यदि कोई दूसरा खड़ा हो तो वह देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालना।

ऋषिरुवाच॥६॥
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः।
वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥७॥
स दृष्ट्‌वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्।
जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः॥८॥
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति।
ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्॥९॥

ऋषि कहते हैं – 
शुम्भके इस प्रकार आज्ञा देनेपर वह धूम्रलोचन दैत्य साठ हजार असुरोंकी सेनाको साथ लेकर वहाँसे तुरंत चल दिया। वहाँ पहुँचकर उसने हिमालयपर रहनेवाली देवीको देखा और ललकारकर कहा – “अरी ! तू शुम्भ-निशुम्भ के पास चल। यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा।

देव्युवाच॥१०॥
दैत्येश्‍वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः।
बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम्॥११॥

देवी बोलीं – 
तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशामें यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ?

ऋषिरुवाच॥१२॥
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः।
हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः॥१३॥
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्‍वधैः॥१४॥
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम्।
पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः॥१५॥
कांश्‍चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान्।
आक्रम्य चाधरेणान्यान्‌ स जघान महासुरान्॥१६॥
केषांचित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी।
तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक्॥१७॥
विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे।
पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः॥१८॥
क्षणेन तद्‌बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना।
तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना॥१९॥
श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्।
बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः॥२०॥
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः।
आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥२१॥
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ।
तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु॥२२॥
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि।
तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्॥२३॥
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते।
शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ॐ॥२४॥

ऋषि कहते हैं – 
देवीके यों कहनेपर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने 'हुं' शब्दके उच्चारणमात्रसे उसे भस्म कर दिया। फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्योंकी विशाल सेना और अम्बिकाने एक-दूसरेपर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसोंकी वर्षा आरम्भ की। इतनेमें ही देवीका वाहन सिंह क्रोधमें भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ असुरोंकी सेनामें कूद पड़ा। उसने कुछ दैत्योंको पंजोंकी मारसे, कितनोंको अपने जबड़ोंसे और कितने ही महादैत्योंको पटककर ओठकी दाढोसे घायल करके मार डाला।
उस सिंहने अपने नखोंसे कितनोंके पेट फाड़ डाले और थप्पड मारकर कितनोंके सिर धड्‌से अलग कर दिये। कितनोंकी भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दनके बाल हिलाते हुए उसने दूसरे दैत्योंके पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया। अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए देवीके वाहन उस महाबली सिंहने क्षणभरमें ही असुरोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला।

शुम्भने जब सुना कि देवीने धूम्रलोचन असुरको मार डाला तथा उसके सिंहने सारी सेनाका सफाया कर डाला, तब उस दैत्यराजको बड़ा क्रोध हुआ। उसका ओठ काँपने लगा। उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्योंको आज्ञा दी।

“हे चण्ड ! और हे मुण्ड ! तुम लोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ, उस देवीको पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लानेमें संदेह हो तो युद्धमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेनाका प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना। उसकी हत्या होने तथा सिंहके भी मारे जानेपर उस अम्बिकाको बाँधकर साथ ले शीघ्र ही लौट आना।


इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भनिशुम्भसेनानीधूम्रलोचनवधो नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवीमाहाम्य में "धूम्रलोचन वध" नामक  छठा अध्याय पूरा हुआ।


सातवा अध्याय - ‘चण्ड-मुण्ड-वध’ 
(श्री दुर्गा सप्तशती)  
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ ध्यायेयं रत्‍नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्‌गींन्यस्तैकाङ्‌घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रांमातङ्‌गीं शङ्‍खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥

।। ध्यान।।

मैं मातङ्गीदेवीका ध्यान करता (करती) हूँ। वे रत्नमय सिंहासनपर बैठकर पढ़ते हुए तोतेका मधुर शब्द सुन रही हैं। उनके शरीरका वर्ण श्याम है। वे अपना एक पैर कमलपर रखे हुए हैं और मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करती हैं तथा पुष्पोंकी माला धारण किये वीणा बजाती हैं। वे लाल रंगकी साड़ी पहने हाथमें शंखमय पात्र लिये हुए हैं। उनके वदनपर मधुका हलका-हलका प्रभाव जान पड़ता है और ललाटमें बिंदी शोभा दे रही है।

“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्‍चण्डमुण्डपुरोगमाः।
चतुरङ्‍गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः॥२॥
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम्।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्‌गे महति काञ्चने॥३॥
ते दृष्ट्‌वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः॥४॥
ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति।
कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा॥५॥
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।
काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥६॥
विचित्रखट्‌वाङ्‌गधरा नरमालाविभूषणा।
द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा॥७॥
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा।
निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्‌मुखा॥८॥
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान्।
सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्‌बलम्॥९॥
पार्ष्णिग्राहाङ्‌कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्।
समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्॥१०॥

ऋषि कहते हैं- 
तदनंतर शुम्भ की आज्ञा पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरंगिनी सेना के साथ अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो चल दिए। फिर गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय ऊंचे शिखर पर पहुंचकर उन्होंने सिंह पर बैठी देवी को देखा। वे मंद-मंद मुस्करा रही थीं। उन्हें देखकर दैत्य लोग तत्परता से पकडने का उद्योग करने लगे। किसी ने धनुष तान लिया किसी ने तलवार संभाली और कुछ लोग देवी के पास आकर खड़े हो गए।

तब अम्बिका ने उन शत्रुओं के प्रति बड़ा क्रोध किया। उस समय क्रोध के कारण उनका मुख काला पड़ गया। ललाटमें भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहां से तुरंत विकरालमुखी काली प्रकट हुईं, जो तलवार और पाश लिए हुए थीं।

वे विचित्र खट्वाङ्ग धारण किए और चीते के चर्म की साड़ी पहने नर-मुंडो की मालासे विभूषित थीं। उनके शरीर का मांस सूख गया था, केवल हड्डियों का ढांचा था जिससे वे अत्यंत भयंकर जान पड़ती थीं। उनका मुख बहुत विशाल था, जीभ लपलपाने के कारण वे और भी डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आंखें भीतर को धंसी हुई और कुछ लाल थीं, वे अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजा रही थीं। बड़े-बड़े दैत्यों का वध करती हुई वे कालिका देवी बड़े वेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ीं और उन सबका भक्षण करने लगीं। वे पार्श्व रक्षकों, अंकुशधारी महावतों, योद्धाओं और घंटा सहित कितने ही हाथियोंको एक ही हाथ से पकड़कर मुंह में डाल लेती थीं।

तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्‍चर्वयन्त्य*तिभैरवम्॥११॥
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्।
पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्॥१२॥
तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः।
मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि॥१३॥
बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम्।
ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्‍चाताडयत्तथा॥१४॥
असिना निहताः केचित्केचित्खट्‌वाङ्‌गताडिताः*।
जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा॥१५॥
क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम्।
दृष्ट्‌वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम्॥१६॥
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः।
छादयामास चक्रैश्‍च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः॥१७॥
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्।
बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्॥१८॥
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी।
कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला॥१९॥
उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत।
गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्*॥२०॥

इसी प्रकार घोड़े, रथ और सारथिके साथ रथी सैनिकों को मुंह में डालकर वे उन्हें बड़े भयानक रूप से चबा डालती थीं। किसी के बाल पकड़ लेतीं, किसी का गला दबा देतीं, किसी को पैरों से कुचल डालतीं और किसी को छाती के धक्के से गिराकर मार डालती थीं। वे असुरों के छोड़े हुए बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र मुंह से पकड़ लेतीं और रोष में भरकर उनको दांतों से पीस डालती थीं।
काली ने बलवान एवं दुरात्मा दैत्यों की वह सारी सेना रौंद डाली, खा डाली और कितनों को मार भगाया। कोई तलवार के घाट उतारे गए, कोई खट्वांग से पीटे गए और कितने ही असुर दांतों के अग्रभाग से कुचले जाकर मृत्यु को प्राप्त हुए।
इस प्रकार देवी ने असुरों की उस सारी सेनाको क्षणभर में मार गिराया। यह देख चण्ड उन अत्यंत भयानक काली देवी की ओर दौड़ा। महादैत्य मुण्ड ने भी अत्यंत भयंकर बाणों की वर्षा से तथा हजारों बार चलाए हुए चक्रों से उन भयानक नेत्रों वाली देवी को आच्छादित कर दिया। वे अनेकों चक्र देवी के मुख में समाते हुए ऐसे जान पड़े, मानो सूर्य के बहुतेरे मंडल बादलों के उदर में प्रवेश कर रहे हों। तब भयंकर गर्जना करने वाली काली ने अत्यंत रोष में भरकर विकट अट्टाहास किया। उस समय उनके विकराल बदन के भीतर कठिनता से देखे जा सकने वाले दांतों की प्रभा से वे अत्यंत उज्वल दिखायी देती थीं। देवी ने बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर ‘हं’ का उच्चारण करके चण्ड पर धावा किया और उसके केश पकड़कर उसी तलवार से उसका मस्तक काट डाला।

अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्‌वा चण्डं निपातितम्।
तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा॥२१॥
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्‌वा चण्डं निपातितम्।
मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्॥२२॥
शिरश्‍चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च।
प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्॥२३॥
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू।
युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि॥२४॥

चण्ड को मारा गया देखकर मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा। तब देवी ने रोष में भरकर उसे भी तलवार से घायल करके धरती पर सुला दिया। महापराक्रमी चण्ड और मुण्ड को मारा गया देख मरने से बची हुई बाकी सेना भय से व्याकुल हो चारों ओर भाग गयी। तदनंतर काली ने चण्ड और मुण्ड का मस्तक हाथ में ले चण्डिका के पास जाकर प्रचंड अट्टाहास करते हुए कहा – “देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड नामक इन दो महापशुओं को तुम्हें भेंट किया है। अब युद्ध में तुम शुम्भ और निशुम्भ का स्वयं ही वध करना।”

ऋषिरुवाच॥२५॥
तावानीतौ ततो दृष्ट्‌वा चण्डमुण्डौ महासुरौ।
उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः॥२६॥
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ॐ॥२७॥

ऋषि कहते हैं – वहां लाए हुए उन चण्ड-मुण्ड नामक महादैत्यों को देखकर कल्याणमयी चण्डी ने काली से मधुर वाणी में कहा, “देवि ! तुम चण्ड और मुण्ड को लेकर मेरे पास आयी हो, इसलिए संसार में चांमुडा के नाम से तुम्हारी ख्याति होगी।”


इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥

इस प्रकार श्री मार्कंडेयपुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवीमाहाम्य में ‘चण्ड-मुण्ड वध’ नामक सातवां अध्याय पूरा हुआ।

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
10/7/10/9/2021

शैबचकूस्ककाकागौसि

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