05. पंचम नवरात्र पूजा || स्कन्दमाता चरित + पंचम अध्याय (दुर्गा सप्तशती)
05. पंचम नवरात्र पूजा || स्कन्दमाता चरित || एवं
पंचम अध्याय (दुर्गा सप्तशती)
पंचम स्कन्दमाता
माँ दुर्गा के पांचवे स्वरूप का नाम स्कन्दमाता है। नवरात्रि में पांचवे दिन अर्थात पंचमी को माँ स्कन्दमाता की पूजा की जाती है। माँ का वर्ण कमल के पुष्प के समान पूर्णतः शुभ्र है और ये कमल के पुष्प पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हे पद्मासना भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण दुर्गा के इस पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। इनके विग्रह में भगवान स्कन्द अपनी माता की गोद में बालरूप में विराजमान हैं। इनके चार भुजाएं हैं। इसलिए इन्हे चतुर्भुजाधारी भी कहा जाता है। ये अपनी दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को पकड़े हुए हैं तथा दाहिनी ऊपर को उठी निचली भुजा में कमल पकड़ा हुआ है। देवी स्कन्दमाता का मंत्र ‘ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चै। ऊँ स्कन्दमातेति नमः।’ है।
पूर्व जन्म में ये पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी तब इन्होने भगवान शंकर जी को प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की और ब्रह्मचारिणी कहलायीं। इन्होंने अपनी तपस्या से भगवान चन्द्रमौलि शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। भगवान स्कन्द को जन्म देने के कारण ही देवी ब्रह्मचारिणी को भगवान स्कन्द की माता अर्थात स्कन्दमाता होने का गौरव प्राप्त हुआ। एकबार देवासुर संग्राम में कुमार स्कन्द देवताओं के सेनापित भी बने थे। पुराणों में कुमार स्कन्द को कुमार और शक्तिधर बताकर इनका वर्णन किया गया है। कुमार स्कन्द का वाहन मयूर होने के कारण स्कन्दको मयूरवाहना के नाम से भी जाना जाता है।
नवरात्र पूजा में इस दिन साधक का मन विशुद्धिचक्र में स्थापित हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस चक्र में अवस्थित साधक के मन से समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाने से उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर बढ़ने लगता है। इस समय साधकों को अपने मन को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। इनकी उपासना समस्त इच्छाओं को पूर्ण करती है। इनकी पूजा के साथ ही भगवान स्कन्द की पूजा स्वयमेव ही हो जाती है। साधक परमशक्ति व परम सुख का अनुभव करता है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज व प्रभामंडल से घिरा रहता है। साधक को, इस अवस्था में अपने मन को एकाग्र रखकर माँ के शरणागत हो जाना चाहिए।
इनकी कृपा से मूढ भी ज्ञानी बन जाता है। इनकी साधना भवसागर से मुक्त कर मोक्ष मार्ग को सुलभ बनाने वाली है। अतः साधक को मोक्ष व ज्ञान प्राप्त करने के लिए इनकी पूजा में संलग्न रहना चाहिए।
शुभ-दास्तु सदा देवी स्कन्द-माता यशस्विनी ।।
या देवी सर्व-भूतेषु माँ स्कंद-माता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्ध-कृत-शेखराम्।
सिंह-आरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्द-माता यशस्वनीम्।।
धवल-वर्णा विशुध्द चक्र-स्थितों पंचम दुर्गा त्रि-नेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्र-धराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदु-हास्या नानां-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्न-कुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वां-धरा कांत कपोला पीन पयो-धराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्ब-नीम्॥
नमामि स्कन्द-माता स्कन्द-धारिणीम्।
समग्र-तत्व-सागरम्-पार-पार गहराम्॥
शिवा-प्रभा सम-उज्वलां स्फुच्छ-शाग-शेखराम्।
ललाट-रत्न-भास्करां जगत्प्रीन्ति-भास्कराम्॥
महेन्द्र-कश्यप-अर्चिता सनंतकुमार-रस-स्तुताम्।
सुर-आसुरेन्द्र-वन्दिता यथार्थ-निर्मल-अदभुताम्॥
अतर्क्य-रोचिरू-विजां विकार दोष-वर्जिताम्।
मुमुक्षुभि-र्वि-चिन्तता विशेष-तत्वम्-उचिताम्॥
नाना-अलंकार भूषितां मृगेन्द्र-वाहन-अग्रजाम्।
सुशुध्द-तत्व-तोषणां त्रिवेन्द-मार-भुषताम्॥
सुधार्मि-कौप-कारिणी सुरेन्द्र-कौरि-घातिनीम्।
शुभां पुष्प-मालिनी सुकर्ण-कल्प-शाखिनीम्॥
तमो-अन्धकार-यामिनी शिव-स्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्-सूर्य-राजिका धनज्ज्योग-कारि-काम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभड-वृन्दम-उजल्लाम्।
प्र-जायिनी प्रजा-वति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्म-कारिणी गति हरि-प्रयाच पार्वतीम्।
अनन्त-शक्ति कान्तिदां यशो-अर्थ-भुक्ति-मुक्ति-दाम्॥
पुनःपुनर्जग-द्वितां नमाम्यहं सुर-अर्चिताम्।
जय-ऐश्वरि त्रि-लोचने प्रसीद देवी-पाहि-माम्॥
ऐं बीजा-लिंका देवी पद-युग्म-घरा-परा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्ध-माता पुत्र-प्रदा॥
वाणं-वपण-मृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथ-अग्नेव वारुणे नैॠते-अवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैव-असितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्या-अन्यासु हि दिक्षु वै॥
माँ स्कंदमाता बीज मंत्र:-
ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:
बीज मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करे।माँ के बीज मंत्र की माला का जाप करने से आपके सभी रुके हुए काम पूर्ण होने लगते है । संतान से संबंधित समस्त समस्याओं का निवारण होता है।
माँ स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है।
माँ स्कंदमाता मंत्र
सिंहा-सना गता नित्यं पद्मा-श्रित-कर-द्वया ।शुभ-दास्तु सदा देवी स्कन्द-माता यशस्विनी ।।
या देवी सर्व-भूतेषु माँ स्कंद-माता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
माँ स्कंदमाता ध्यान
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्ध-कृत-शेखराम्।
सिंह-आरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्द-माता यशस्वनीम्।।
धवल-वर्णा विशुध्द चक्र-स्थितों पंचम दुर्गा त्रि-नेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्र-धराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदु-हास्या नानां-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्न-कुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वां-धरा कांत कपोला पीन पयो-धराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्ब-नीम्॥
माँ स्कंदमाता स्तोत्र
नमामि स्कन्द-माता स्कन्द-धारिणीम्।
समग्र-तत्व-सागरम्-पार-पार गहराम्॥
शिवा-प्रभा सम-उज्वलां स्फुच्छ-शाग-शेखराम्।
ललाट-रत्न-भास्करां जगत्प्रीन्ति-भास्कराम्॥
महेन्द्र-कश्यप-अर्चिता सनंतकुमार-रस-स्तुताम्।
सुर-आसुरेन्द्र-वन्दिता यथार्थ-निर्मल-अदभुताम्॥
अतर्क्य-रोचिरू-विजां विकार दोष-वर्जिताम्।
मुमुक्षुभि-र्वि-चिन्तता विशेष-तत्वम्-उचिताम्॥
नाना-अलंकार भूषितां मृगेन्द्र-वाहन-अग्रजाम्।
सुशुध्द-तत्व-तोषणां त्रिवेन्द-मार-भुषताम्॥
सुधार्मि-कौप-कारिणी सुरेन्द्र-कौरि-घातिनीम्।
शुभां पुष्प-मालिनी सुकर्ण-कल्प-शाखिनीम्॥
तमो-अन्धकार-यामिनी शिव-स्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्-सूर्य-राजिका धनज्ज्योग-कारि-काम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभड-वृन्दम-उजल्लाम्।
प्र-जायिनी प्रजा-वति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्म-कारिणी गति हरि-प्रयाच पार्वतीम्।
अनन्त-शक्ति कान्तिदां यशो-अर्थ-भुक्ति-मुक्ति-दाम्॥
पुनःपुनर्जग-द्वितां नमाम्यहं सुर-अर्चिताम्।
जय-ऐश्वरि त्रि-लोचने प्रसीद देवी-पाहि-माम्॥
माँ स्कंदमाता कवच
ऐं बीजा-लिंका देवी पद-युग्म-घरा-परा।
हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।
सर्वांग में सदा पातु स्कन्ध-माता पुत्र-प्रदा॥
वाणं-वपण-मृते हुं फ्ट बीज समन्विता।
उत्तरस्या तथ-अग्नेव वारुणे नैॠते-अवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैव-असितांगी च संहारिणी।
सर्वदा पातु मां देवी चान्या-अन्यासु हि दिक्षु वै॥
माँ स्कंदमाता बीज मंत्र:-
ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:
बीज मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करे।माँ के बीज मंत्र की माला का जाप करने से आपके सभी रुके हुए काम पूर्ण होने लगते है । संतान से संबंधित समस्त समस्याओं का निवारण होता है।
माँ स्कंदमाता भोग
पाँचवाँ अध्याय - “देवी-दूत-संवाद”
देवीकी स्तुति
अर्थ सहित
॥विनियोगः॥
ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रूद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
विनियोग
ॐ – इस उत्तर चरित्रके रुद्र ऋषि हैं, महासरस्वती देवता हैं, अनुष्टप छन्द है, भीमा शक्ति है, भ्रामरी बीज है, सूर्य तत्त्व है और सामवेद स्वरूप है। महासरस्वतीकी प्रसन्नता के लिये उत्तर चरित्रके पाठमें इसका विनियोग किया जाता है।
॥ध्यानम्॥
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
।। ध्यान ।।
जो अपने करकमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, शरद-ऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाके समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवीका मैं निरन्तर भजन करता (करती) हूँ।
ऊं नमश्चंडिकायैः नमो नमः
“ॐ क्लीं” ऋषिरुवाच॥१॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात्॥२॥
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥३॥
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥४॥
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥५॥
तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥६॥
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥७॥
महर्षि मेधा कहते हैं-
पूर्वकाल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने अपने बल के घमंड में आकर शचीपति इंद्र के हाथ से तीनों लोकों का राज्य और यज्ञभाग छीन लिए। वे दोनों सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार का भी उपयोग करने लगे। वायु और अग्नि का कार्य भी वे ही करने लगे। उन दोनों ने सब देवताओं को अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन करके स्वर्ग से निकाल दिया।
उन दोनों असुरों से तिरस्कृत देवताऒं ने अपराजिता देवी का स्मरण किया और सोचा – “जगदम्बा ने वर दिया था कि आपत्ति काल में स्मरण करने पर मैं तुम्हारी आपत्तियों का नाश कर दूंगी।” यह विचारकर देवता गिरिराज हिमालयपर गए और वहां भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे।
देवा ऊचुः॥८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥९॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्ये धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥१०॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥११॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥१२॥
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥१३॥
देवता बोले –
देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हमलोग नियमपूर्वक जगदम्बाको नमस्कार करते हैं। रौद्रा को नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्री को बारम्बार नमस्कार है। ज्योत्सनामयी, चद्ररूपिणी एवं सुख स्वरूपा देवी को सतत प्रणाम है। शरणागतों का कल्याण करने वाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को हम बारम्बार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी)-स्वरूपा आप जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है।
दुर्गा, दुर्गपारा (दुर्गम संकट से पार उतारनेवाली), सारा (सबकी सारभूता), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रा देवी को सर्वदा नमस्कार है। अत्यंत सौम्य तथा अत्यंत रौद्ररूपा देवी को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारम्बार प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै॥१४॥
नमस्तस्यै॥१५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१६॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै॥१७॥
नमस्तस्यै॥१८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥१९॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२०॥
नमस्तस्यै॥२१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२२॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२३॥
नमस्तस्यै॥२४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२५॥
जगत की आधारभूता कृति देवी को बारम्बार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में विष्णु माया के नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै॥२६॥
नमस्तस्यै॥२७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥२८॥
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥२९॥
नमस्तस्यै॥३०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३१॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३२॥
नमस्तस्यै॥३३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३४॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३५॥
नमस्तस्यै॥३६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥३७॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥३८॥
नमस्तस्यै॥३९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४०॥
जो देवी सब प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में शक्तिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में क्षमा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४१॥
नमस्तस्यै॥४२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४३॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४४॥
नमस्तस्यै॥४५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४६॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥४७॥
नमस्तस्यै॥४८॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥४९॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५०॥
नमस्तस्यै॥५१॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५२॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५३॥
नमस्तस्यै॥५४॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५५॥
जो देवी सब प्राणियों में जातिरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में शांति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में कांति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५६॥
नमस्तस्यै॥५७॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥५८॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥५९॥
नमस्तस्यै॥६०॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६१॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६२॥
नमस्तस्यै॥६३॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६४॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६५॥
नमस्तस्यै॥६६॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥६७॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥६८॥
नमस्तस्यै॥६९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७०॥
जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में वृत्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में स्मृति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में दया रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७१॥
नमस्तस्यै॥७२॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७३॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता॥
नमस्तस्यै॥७४॥
नमस्तस्यै॥७५॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥७६॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः॥७७॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै॥७८॥
नमस्तस्यै॥७९॥
नमस्तस्यै नमो नमः॥८०॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥८१॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥८२॥
जो देवी सब प्राणियों में मातारूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी सब प्राणियों में भ्रांति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
जो जीवों के इंद्रिय वर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं, उन व्याप्ति देवी को बारम्बार नमस्कार है।
जो देवी चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।
पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इंद्र ने बहुत दिनोंतक जिनका ध्यान किया, वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करें तथा सारी विपत्तियों का नाश कर डाले।
उद्दंड दैत्यों से सताए हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरी को इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्ति से विनम्र पुरुषों द्वारा स्मरण किये जाने पर तत्काल ही सभी संकटों का नाश कर देती हैं, वे जगदम्बा हमारा संकट दूर करें।
ऋषिरुवाच॥८३॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन॥८४॥
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा॥८५॥
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः॥८६॥
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥८७॥
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥८८॥
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः॥८९॥
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्॥९०॥
मेधा ऋषि कहते हैं –
राजन! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे थे, उस समय पार्वती देवी गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहां आईं। उन सुंदर भौंहों वाली भगवती ने देवताओं से पूछा- “आपलोग यहां किसकी स्तुति करते हैं?”
तब उन्हीं के शरीर कोश से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं – “शुम्भ दैत्य से तिरस्कृत और युद्ध में निशुम्भ से पराजित हो यहाँ एकत्रित हुए ये समस्त देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।”
पार्वतीजी के शरीर कोश से अम्बिका का प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिए वे समस्त लोकों में “कौशिकी” कही जाती हैं। कौशिकी के प्रकट होने के बाद पार्वती देवी का शरीर काले रंग का हो गया, अत: वे हिमालयपर रहनेवाली कालिका देवीके नामसे विख्यात हुईं। तदनतर शुम्भ-निशुम्भ के भृत्य चण्ड-मुण्ड वहां आए और उन्होंने परम मनोहर रूप धारण करने वाली अम्बिका देवी को देखा। वे शुम्भ के पास जाकर बोले- “महाराज! एक अत्यंत मनोहर स्त्री है, जो अपनी दिव्य कांति से हिमालय को प्रकाशित कर रही है।”
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर॥९१॥
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति॥९२॥
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे॥९३॥
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥९४॥
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥९५॥
वैसा उत्तम रूप कहीं किसी ने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर ! पता लगाइए, वह देवी कौन है और उसे ले लीजिये। स्त्रियों में तो वह रत्न है, उसका प्रत्येक अंग बहुत ही सुंदर है तथा वह अपनी प्रभा से संपूर्ण दिशाओं में प्रकाश फैला रही है। दैत्यराज ! अभी वह हिमालय पर ही मौजूद है। आप उसे देख सकते हैं। हे प्रभो ! तीनों लोकों में मणि, हाथी और घोड़े आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके चरणों में शोभा पाते हैं। हाथियों में रत्नभूत ऐरावत, यह पारिजात का वृक्ष और यह उच्चैश्रवा घोड़ा – यह सब आपने इंद्र से ले लिया है। हंसों से जुता हुआ यह विमान भी आपके आंगन में शोभा पाता है। यह रत्नभूत अद्भुत विमान, जो पहले ब्रह्माजी के पास था, अब आपके यहां लाया गया है। यह महापद्म नामक निधि आप कुबेर से छीन लाए हैं।
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम्॥९६॥
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुराऽऽसीत्प्रजापतेः॥९७॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे॥९८॥
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी॥९९॥
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते॥१००॥
समुद्रने भी आपको किंजल्किनी नाम की माला भेंट की है, जो केसरों से सुशोभित है और जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैं। सुवर्ण की वर्षा करनेवाला वरुण का छत्र भी आपके घर में शोभा पाता है। तथा यह श्रेष्ठ रथ जो पहले प्रजापतीके अधिकार में था, अब आपके पास मौजूद है।
दैत्येश्वर ! मृत्यु की उत्क्रांतिदा नामक शक्ति भी आपने छीन ली है तथा वरुण का पाश और समुद्र में होने वाले सब प्रकार के रत्न आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें हैं।
अग्नि ने भी स्वत: शुद्ध किए हुए दो वस्त्र आपकी सेवामें अर्पित किए हैं।
हे दैत्यराज ! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिए हैं। फिर जो यह स्त्रियों में रत्नरूप कल्याणमयी देवी हैं, इसे आप क्यों नहीं अपने अधिकारमें कर लेते?
ऋषिरुवाच॥१०१॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्॥१०२॥
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु॥१०३॥
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने।
सा देवी तां ततः प्राहश्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥१०४॥
मेधा ऋषि कहते हैं –
चण्ड-मुण्ड का यह वचन सुनकर शुम्भ ने महादैत्य सुग्रीव को दूत बनाकर देवी के पास भेजा और कहा – “तुम मेरी ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना जिससे प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहां आ जाए।”
वह दूत पर्वत के रमणीय प्रदेश में जहां देवी मौजूद थीं, वहां गया और मधुर वाणी में कोमल वचन बोला।
दूत उवाच॥१०५॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः॥१०६॥
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह श्रृणुष्व तत्॥१०७॥
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक्॥१०८॥
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः।
तथैव गजरत्नं च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम्॥१०९॥
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः।
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्॥११०॥
दूत बोला –
“देवि ! दैत्यराज शुम्भ इस समय तीनों लोकों के परमेश्वर हैं। मैं उन्हीं का भेजा दूत हूं और यहां तुम्हारे पास आया हूं।”
उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक स्वर से मानते हैं। कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। वे सम्पूर्ण देवताओं को परास्त कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया है, उसे सुनो – “सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे अधिकार में है। देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हैं। सभी यज्ञों के भागों को मैं ही पृथक-पृथक भोगता हूं।
तीनों लोकों में जितने श्रेष्ठ रत्न हैं, वे सब मेरे अधिकार में हैं। देवराज इंद्र का वाहन ऐरावत, जो हाथियों में रत्नके समान है, मैंने छीन लिया है। क्षीर सागर का मंथन करने से जो अश्वरत्न उच्चैश्रवा प्रकट हुआ था, उसे देवताओं ने मेरे पैरों पर पड़कर समर्पित किया है।
यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च।
रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्।
भज त्वं च चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः॥११३॥
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्।
एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज॥११४॥
सुंदरी ! उनके सिवा और भी जितने रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गधर्वों और नागों के पास थे, वे सब मेरे ही पास आ गए हैं।
देवि ! हम लोग तुम्हें संसार की स्त्रियों में रत्न मानते हैं, अत: तुम हमारे पास आ जाओ क्योंकि रत्नों का उपभोग करनेवाले हम ही हैं। चंचल कटाक्षों वाली सुंदरी ! तुम मेरी या मेरे भाई महापराक्रमी निशुम्भ की सेवा में आ जाओ क्योंकि तुम रत्न स्वरूपा हो। मेरा वरण करने से तुम्हें तुलनारहित महान ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। अपनी बुद्धि से यह विचारकर तुम मेरी पत्नी बन जाओ।
ऋषिरुवाच॥११५॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ।
दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्॥११६॥
मेधा ऋषि कहते हैं –
दूत के यों कहने पर कल्याणमयी भगवती दुर्गादेवी, जो इस जगत को धारण करती हैं, मन-ही-मन गम्भीर भाव से मुस्कराई और इस प्रकार बोलीं –
देव्युवाच॥११७॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः॥११८॥
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा॥११९॥
यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः।
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥१२१॥
देवी ने कहा –
दूत ! तुमने सत्य कहा है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। शुम्भ तीनों लोकों का स्वामी है और निशुम्भ भी उसी के समान पराक्रमी है किंतु इस विषयमें मैंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसे मिथ्या कैसे करूँ? मैंने अपनी अल्पबुद्धि के कारण पहले से जो प्रतिज्ञा कर रखी है उसे सुनो।
“जो मुझे संग्राम में जीत लेगा, जो मेरे अभिमान को चूर कर देगा तथा संसार में जो मेरे समान बलवान होगा, वही मेरा स्वामी होगा। इसलिए शुम्भ अथवा निशुम्भ स्वयं ही यहां पधारें और मुझे जीतकर मेरा पाणिग्रहण कर लें, इसमें विलम्ब की क्या आवश्यकता?”
दूत उवाच॥१२२॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः॥१२३॥
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका॥१२४॥
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे।
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्॥१२५॥
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।
केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि॥१२६॥
दूत बोला –
देवि ! तुम घमंड में भरी, मेरे सामने ऐसी बातें न करो। तीनों लोकों में कौन ऐसा पुरुष है, जो शुम्भ-निशुम्भके सामने खड़ा हो सके।
देवि ! अन्य दैत्यों के सामने भी सारे देवता युद्ध में नहीं ठहर सकते, फिर तुम अकेली स्त्री होकर कैसे ठहर सकती हो। जिन शुम्भ आदि दैत्यों के सामने इंद्र आदि सब देवता भी युद्ध में खड़े नहीं हुए, उनके सामने तुम स्त्री होकर कैसे जाओगी। इसलिए तुम मेरे ही कहने से शुम्भ-निशुम्भ के पास चलो। ऐसा करने से तुम्हारे गौरवकी रक्षा होगी, अन्यथा जब वे केश पकड़कर घसीटेंगे, तब तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा खोकर जाना पड़ेगा।
देव्युवाच॥१२७॥
एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान्।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा॥१२८॥
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत्॥ॐ॥१२९॥
देवी ने कहा –
तुम्हारा कहना ठीक है, शुम्भ बलवान हैं। निशुम्भ भी पराक्रमी है; किंतु मैंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है। अत: अब तुम जाओ। मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अपने स्वामी से कहना। वे जो उचित जान पड़े, करें।
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥
इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवीमाहाम्य में “देवी-दूत-संवाद ” नामक पांचवां अध्याय पूरा हुआ।


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