03. तृतीय नवरात्र पूजा || चंद्रघंटा चरित + तृतीय अध्याय (दुर्गा सप्तशती)

03. तृतीय नवरात्र पूजा || चंद्रघंटा चरित || 
एवं
तृतीय अध्याय (दुर्गा सप्तशती)
 
नवदुर्गा स्वरूप 03. चंद्रघंटा

मांँ दुर्गा की नौ शक्तियों में तीसरा स्वरूप   चंद्रघंटा है। तीसरे नवरात्रि अर्थात तृतीया को माता चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है। 

दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखेे, रखें धनुष बाण।
घंटा ध्वनि से हरती मां चंद्रघंटा दुष्टों के प्राण।।

मांँ का यह स्वरूप सबकेेेेेेेे लिए शांति दायक तथा कल्यााणकारी हैै। इनके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा बिराजता है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। कुछ भक्त इसका अर्थ इस प्रकार लगाते हैं कि 'चंद्रघंटाया यस्य सा' अर्थात जिसके घंटे में आलस्य युक्त चंद्रमा का वास है। वही चंद्रघंटा कहलाती हैैं।

इनके तीन नेत्र तथा दस हाथ हैं । जो खड्ग, बाण त्रिशूल, धनुष, गदा आदि दस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित हैं। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है। इनका वाहन सिंह है। यह देवी उग्र रूप हैं तथा युद्ध के लिए उद्यत रहने वाली हैं । भक्तों को अभयदान देने वाली यह देवी अपने घंटे की प्रचंड ध्वनि से दानवों , अत्याचारियों,  दैत्यों व राक्षसों का नाश कर डालती हैं। इनके घंटे की ध्वनि भक्तों की प्रेत बाधा आदि से सदा रक्षा करती हैं । दुष्ट-दमनकारी व विनाशक रूप के बाद भी यह देवी साधक के लिए अत्यंत सौम्य एवं शांत रहती हैं।

नवरात्रों की तीसरे दिन की पूजा का भी अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है । कहा जाता है कि इस अवस्था में साधक को दिव्य ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं तथा उसे दिव्य सुगंध का एहसास होने लगता है। इस अवस्था में साधक को अत्यंत सावधान रहना चाहिए । साधक को चाहिए कि मन, वचन, कर्म तथा काया से पूर्णत: शुद्ध होकर माता की साधना में रत रहे। ये साधक को सहज ही परम पद का अधिकारी बना देती हैं। इनका ध्यान इहलोक ही नहीं परलोक में भी सदा सद्गति देने वाला है।

मांँ चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं नष्ट हो जाती हैं । इनकी आराधना सदा सद्य फलदाई है। यह शीघ्र ही भक्तों के कष्टों का निवारण कर देती हैं। इनका उपासक इनके वाहन सिंह की तरह पराक्रमी, वीर और निर्भय हो जाता है। इनकी उपासना से उपासक में सौम्यता तथा नम्रता का विकास होता है। शरीर कांतिमान हो जाता है। उनमें अद्भुत माधुर्य समा जाता है। इनके साधक जहां भी जाते हैं, लोग उन्हें देखकर अनुपम शांति व सुख का अनुभव करते हैं । इनके शरीर से अदृश्य दिव्य प्रकाश विकरित होता रहता है। संपर्क में आने वाले लोग इसका प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए प्रसन्नता महसूस करते हैं। देवी चंद्रघंटा का मंत्र *ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ चंद्रघंटा देवयै नमः।* है। 


मांँ चंद्रघंटा का भोग

मांँ चंद्रघंटा की पूजा में अक्षत, पुष्प,‌ गंध, सिंदूर और धूप अवश्य अर्पित करनी चाहिए। ‌इसके साथ मां चंद्रघंटा को चमेली का पुष्प या लाल फूल भी अर्पित करना चाहिए। भोग के दौरान देवी चंद्रघंटा को दूध से बनी मिठाई अर्पित करें।


मां चंद्रघंटा की कथा

बहुत समय पहले जब असुरों का आतंक बढ़ गया था, तब दैत्यों का राजा महिषासुर ने देवताओं के राजा इंद्र से उनका सिंहासन व स्वर्ग छीन लिया। वह अन्य अन्य देवताओं के भोग भी स्वयं ही ग्रहण करने लगा। सभी देव अपनी परेशानी लेकर त्रिदेवों के पास गए।

देवताओं की बात सुनकर तीनों देव बहुत क्रोधित हुए तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के शरीर से  एक तेज उत्पन्न होने लगा तब अन्यान्य देवताओं ने भी उसी तेज में अपने तेज को भी समाहित करा दिया। इस समग्र तेज ने तब एक देवी का रूप लिया।

इस देवी को भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, सूर्य देव ने तेज और तलवार, और बाकी देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र और शस्त्र दिए। इन देवी का नाम चंद्रघंटा रखा गया।

इस प्रकार दैत्यों को सबक सिखाने के लिए मां दुर्गा ने अपने चंद्रघंटा नामक तीसरे स्वरूप में अवतार लिया और महिषासुर का संहार कर दिया था।


मंत्र
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्ड-कोपास्त्र-कैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चन्द्र-घण्टेति विश्रुता।।

ध्यान

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पदम कमण्डलु माला वराभीत-कराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदु-हास्या नाना-अलंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर, किंकिणि, रत्न-कुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिब-आधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

आप-दुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभ-पराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्र-मुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धन-दात्री, आनन्द-दात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूप-धारिणी इच्छा-नयी ऐश्वर्य-दायनीम्।
सौभाग्य-आरोग्य-दायिनी चंद्र-घंटा-प्रणमाभ्यहम्॥

कवच

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्व-सिध्दि-दायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दारं बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दि-दाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

माँ चंद्रघंटा बीज मंत्र:-

ऐं श्रीं शक्तयै नम:

माँ चंद्रघंटा के बीज मंत्र की एक माला अर्थात 108 बार जाप करे। माँ के बीज मंत्रो का जाप करने से आपकी समस्त पारिवारिक समस्या का निस्तारण जल्द से जल्द होगा।



तृतीय अध्याय - महिषासुरवध
(दुर्गा सप्तशती) 
अर्थ सहित

॥ध्यानम्॥

ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्‍नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥
।।ध्यान।।
अर्थ : - जगदम्बाके श्रीअंगोकी कान्ति उदयकालके सहस्रों सूर्योंके समान है। वे लाल रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही है। दोनों स्तनोंपर रक्त चन्दनका लेप लगा है। वे अपने कर-कमलोंमें जपमालिका, विद्या और अभय तथा वर नामक मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। तीन नेत्रोंसे सुशोभित मुखारविन्द की बड़ी शोभा हो रही है। उनके मस्तकपर चन्द्रमाके साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है तथा वे कमलके आसन पर विराजमान हैं। ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता (करती) हूँ।

“ॐ” ऋषिररुवाच॥१॥
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः।
सेनानीश्‍चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्‍धुमथाम्बिकाम्॥२॥
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः।
यथा मेरुगिरेः श्रृङ्‌गं तोयवर्षेण तोयदः॥३॥
तस्यच्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्।
जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्॥४॥
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः॥५॥

ऋषि कहते हैं–
दैत्यों की सेना को इस प्रकार तहस-नहस होते देख महादैत्य सेनापति चिक्षुर क्रोध में भरकर अम्बिका देवीसे युद्ध करने के लिये आगे बढ़ा। वह असुर रणभूमि में देवी के ऊपर इस प्रकार बाणवर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरुगिरि के शिखर पर पानी की धार बरसा रहा हो। तब देवी ने अपने बाणों से उसके बाण समूह को अनायास ही काटकर उसके घोड़ों और सारथि को भी मार डाला। साथ ही उसके धनुष तथा अत्यंत ऊंची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया। धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला।

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्‍वो हतसारथिः।
अभ्यधावत तां देवीं खड्‌गचर्मधरोऽसुरः॥६॥
सिंहमाहत्य खड्‌गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्॥७॥
तस्याः खड्‌गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः॥८॥
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्॥९॥
दृष्ट्‍वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।
तच्छूलं* शतधा तेन नीतं स च महासुरः॥१०॥

धनुष, रथ, घोड़े और सारथि के नष्ट हो जाने पर वह असुर ढाल और तलवार लेकर देवी की ओर दौड़ा। उसने तीखी धार वाली तलवार से सिंह के मस्तक पर चोट करके देवी की बायीं भुजा में भी बड़े वेग से प्रहार किया। राजन् ! देवी की बांह पर पहुंचते ही वह तलवार टूट गयी, फिर तो क्रोध से लाल आंखें करके उस राक्षस ने शूल हाथ में लिया। उसे उस महादैत्य ने भगवती भद्रकाली के ऊपर चलाया। वह शूल आकाश से गिरते हुए सूर्यमडल की भाँति अपने तेज से प्रज्वलित हो उठा। उस शूल को अपनी ओर आते देख देवी ने भी शूल का प्रहार किया। उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गए, साथ ही महादैत्य चिक्षुर की भी धज्जियां उड़ गईं। वह अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।

हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्‍चामरस्त्रिदशार्दनः॥११॥
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्॥१२॥
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्‌वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्॥१३॥
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा॥१४॥
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः॥१५॥

महिषासुर के सेनापति उस महापराक्रमी चिक्षुर के मारे जाने पर देवताओं को पीड़ा देनेवाला चामर हाथी पर चढ़कर आया। उसने भी देवी के ऊपर शक्ति का प्रहार किया, किंतु जगदम्बा ने उसे अपने हुंकार से ही आहत एवं निष्प्रभ करके तकाल पृथ्वी पर गिरा दिया। शक्ति टूटकर गिरी हुई देख, चामर को बड़ा क्रोध हुआ। अब उसने शूल चलाया, किंतु देवी ने उसे भी अपने बाणों द्वारा काट डाला। इतने में ही देवी का सिंह उछलकर हाथी के मस्तकपर चढ़ बैठा और उस दैत्य के साथ खूब जोर लगाकर बाहुयुद्ध करने लगा। वे दोनों लड़ते-लड़ते हाथी से पृथ्वी पर आ गए और क्रोध में भरकर एक-दूसरे पर बड़े भयंकर प्रहार करते हुए लडऩे लगे।

ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्‍चामरस्य पृथक्कृतम्॥१६॥
उदग्रश्‍च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्‍चैव करालश्‍च निपातितः॥१७॥
देवी क्रुद्धा गदापातैश्‍चूर्णयामास चोद्धतम्।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्॥१८॥
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी॥१९॥
बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्॥२०॥

तदनतर सिंह बड़े वेग से आकाश की ओर उछला और उधर से गिरते समय उसने पंजों की मार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसी प्रकार उदग्र भी शिला और वृक्ष आदि की मार खाकर रणभूमि में देवी के हाथसे मारा गया तथा कराल भी दाँतों, मुक्कों और थप्पड़ों की चोट से धराशायी हो गया। क्रोध में भरी हुई देवी ने गदा की चोट से उद्धत का कचूमर निकाल डाला। भिंदिपाल से वाष्कल को तथा बाणों से ताम्र और अंधक को मौत के घाट उतार दिया। तीन नेत्रों वाली परमेश्वरी ने त्रिशूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु नामक दैत्यों को मार डाला। तलवार की चोट से विडाल के मस्तक को धड़ से काट गिराया। दुर्धर और दुर्मुख इन दोनों को भी अपने बाणों से यमलोक भेज दिया।

एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्॥२१॥
कांश्‍चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्‌गूलताडितांश्‍चान्याञ्छृङ्‌गाभ्यां च विदारितान्॥२२॥
वेगेन कांश्‍चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले॥२३॥
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका॥२४॥
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
श्रृङ्‌गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च॥२५॥

इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया। महिषासुर देवी के गणों को थूथुन से मारकर, खुरों का प्रहार करके, पूंछ से चोट पहुंचाकर, सींगों से विदीर्ण करके, कुछ को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और नि:श्वास-वायु के झोंके से धराशायी कर दिया। इस प्रकार गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने के लिए झपटा। इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ। उधर महापराक्रमी महिषासुर भी क्रोध में भरकर धरती को खुरों से खोदने लगा। अपने सींगों से ऊंचे-ऊंचे पर्वतों को उठाकर फेंकने और गर्जने लगा।

वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्‌गूलेनाहतश्‍चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः॥२६॥
धुतश्रृङ्‌गविभिन्नाश्‍च खण्डं* खण्डं ययुर्घनाः।
श्‍वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः॥२७॥
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्‌वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्॥२८॥
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे॥२९॥
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्‌गपाणिरदृश्यत॥३०॥

उसके वेग से चक्कर देने के कारण पृथ्वी क्षुब्ध होकर फटने लगी। उसकी पूंछ से टकराकर समुद्र सब ओर से धरती को डुबोने लगा। हिलते हुए सींगों के आघात से विदीर्ण होकर बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसके श्वास की प्रचंड वायु के वेग से उड़े हुए सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे। इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य को अपनी ओर आते देख चंडिका ने उसका वध करने के लिए महान क्रोध किया। उन्होंने पाश फेंककर उस महान असुर को बांध लिया। उस महासंग्राम में बँध जाने पर वह भैंसे का रूप त्यागकर तत्काल सिंह के रूप में प्रकट हो गया। उस अवस्था में जगदम्बा ज्योंही उसका मस्तक काटने के लिए उद्दत हुईं, त्योंही वह खड्गधारी पुरुष के रूप में दिखायी देने लगा।

तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्‌गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः॥३१॥
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्‌गेन निरकृन्तत॥३२॥
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्॥३३॥
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्‍चैव जहासारुणलोचना॥३४॥
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्‌धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्॥३५॥
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्‌धूतमुखरागाकुलाक्षरम्॥३६॥

तब देवी ने तुरंत ही बाणों की वर्षा करके ढाल और तलवार के साथ उस पुरुष को भी बींध डाला। इतने में ही वह महान गजराज के रूप में परिणत हो गया। वह अपनी सूंड़ से देवी के विशाल सिंह को खींचने और गर्जने लगा। खींचते समय देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट डाली। तब उस महादैत्य ने पुन: भैंसे का शरीर धारण कर लिया और पहले की ही भांति चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों को व्याकुल करने लगा। तब क्रोध में भरी हुई जगत माता चंडिका बारंबार उत्तम मधु का पान करने और लाल आंखें करके हंसने लगीं। उधर वह बल और पराक्रम के मद से उमड़ा हुआ राक्षस गर्जने लगा और अपने सींगों से चंडी के ऊपर पर्वतों को फेंकने लगा। उस समय देवी, अपने बाणों के समूहों से उसके फेंके हुए पर्वतों को चूर्ण करती हुई बोलीं। बोलते समय उनका मुख मधु के मद से लाल हो रहा था और वाणी लडख़ड़ा रही थी।

देव्युवाच॥३७॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३८॥

देवीने कहा
ओ मूढ़ ! मैं जब तक मधु पीती हं, तब तक तू क्षणभर के लिए खूब गर्जना कर ले। मेरे हाथ से यहीं तेरी मृत्यु हो जाने पर अब शीघ्र ही देवता भी गर्जना करेंगे।

ऋषिरुवाच॥३९॥
एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥४०॥
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्* देव्या वीर्येण संवृतः॥४१॥
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः*॥४२॥
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः॥४३॥
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्‍चाप्सरोगणाः॥ॐ॥४४॥

ऋषि कहते हैं
इतना कहकर देवी उछलीं और उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गईं। फिर अपने पैर से उसे दबाकर उन्होंने शूल से उसके कंठ में आघात किया। उनके पैर से दबा होने पर भी महिषासुर अपने मुख से [दूसरे रूपमें बाहर होने लगा] अभी आधे शरीर से ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया। आधा निकला होने पर भी वह महादैत्य देवी से युद्ध करने लगा। तब देवी ने बहुत बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट गिराया। फिर तो हाहाकार करती हुई दैत्यों की सारी सेना भाग गई तथा देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए। देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ दुर्गा देवी की स्तुति की। गंधर्वराज गाने लगे तथा असराएं नृत्य करने लगीं।

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवी माहाम्य में “महिषासुरवध” नामक तीसरा अध्याय संपन्न हुआ।

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
10/5/8/9/21

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